पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों सिर्फ़ कैमरे का एंगल नहीं बदला है, बल्कि पूरी स्क्रिप्ट ही री-राइट हो रही है। मंच, माइक और नारों के बीच अब एक नया सेट सज रहा है—टॉलीवुड का। टॉलीवुड मतलब साउथ इंडियन फिल्म इंडस्ट्री नहीं बल्कि बंगला फिल्म जगत। आजकल कोलकाता में भाजपा नेताओं की बंगला फिल्म अभिनेताओं से बढ़ती मुलाक़ातें महज़ शिष्टाचार या सौजन्य भेंट नहीं, बल्कि उस चुनावी गणित का हिस्सा हैं, जहां स्टार पावर को वोट पावर में तब्दील करने की पुरानी और आज़माई हुई रणनीति फिर से सक्रिय हो रही है।
इस फ़ॉर्मूले की सबसे सफल प्रयोगशाला ममता बनर्जी रही हैं। उन्होंने सिनेमा को सिर्फ़ समर्थन का माध्यम नहीं बनाया, बल्कि उसे सत्ता हासिल करने का एक हथियार भी बनाया। टॉलीवुड के बड़े चेहरे— अभिनेता, अभिनेत्रियाँ, निर्देशक—तृणमूल के टिकट पर संसद और विधानसभा तक पहुंचे। नतीजा साफ़ रहा कि टीएमसी को न सिर्फ़ लोकप्रिय चेहरे मिले, बल्कि बंगाली अस्मिता का ऐसा सॉफ्ट कवर भी मिला, जिसे भाजपा आज तक पूरी तरह भेद नहीं पाई।
ममता की राजनीति का मूल मंत्र रहा— संस्कृति के रास्ते सत्ता तक। उन्होंने यह संदेश दिया कि तृणमूल सिर्फ़ एक पार्टी नहीं, बल्कि “बंगालियत” की प्रतिनिधि है। दुर्गा पूजा से लेकर सिनेमा तक, हर मंच पर राजनीति को भावनाओं में घोल दिया गया।
अब भाजपा उसी मैदान में उतरती दिख रही है, जहां अब तक वह हिचकती रही थी। टॉलीवुड से बढ़ता संपर्क इस बात का संकेत है कि भाजपा अब यह मान चुकी है कि बंगाल में चुनाव सिर्फ़ संगठन, रैली और मोदी फैक्टर से नहीं जीते जाते। यहां लोकल, वोकल और सोशल की भी जरूरत पड़ेगी।
भाजपा के सामने चुनौती दोहरी है। पहली—टॉलीवुड को यह यकीन दिलाना कि बीजेपी “बाहरी पार्टी” नहीं है, जिसे बंगाल की आत्मा समझ नहीं आती। दूसरी—उस नैरेटिव को तोड़ना, जिसमें फिल्म इंडस्ट्री को तृणमूल का स्वाभाविक और स्थायी सहयोगी माना जाता है। यही वजह है कि अब बंद कमरों में मुलाक़ातें हो रही हैं, चाय पर राजनीति परोसी जा रही है और कैमरे से दूर भरोसे का पुल बनाने की कोशिश चल रही है।
सवाल यह है कि कोलकाता की राजनीति में सिनेमा स्टार इतने अहम क्यों हैं?
बंगाल में सिनेमा सिर्फ़ मनोरंजन नहीं, पहचान है। यहां अभिनेता विचारधारा नहीं बेचते—वे भावना बेचते हैं। उनका एक बयान, एक तस्वीर, एक मंच साझा करना—हज़ार पोस्टरों और सौ भाषणों से ज़्यादा असर डाल सकता है। गांव से शहर तक उनकी मौजूदगी “अपनेपन” का एहसास कराता है, जो चुनावी मौसम में सबसे कीमती नजराना होता है।
पॉलिटिकल पार्टी यह भी जानते हैं कि जब जनता नेताओं पर शक करती है, तब वह चेहरों पर भरोसा करती है—ख़ासकर उन चेहरों पर, जिन्हें उसने दशकों तक पर्दे पर देखा है, रोते-हंसते देखा है।
लेकिन यह मान लेना कि हर स्टार वोट दिला देगा, एक खतरनाक राजनीतिक भ्रम हो सकता है। हालिया चुनावों ने दिखाया है कि चमकदार चेहरे भी हार सकते हैं। जनता अब सिर्फ़ सेलिब्रिटी से नहीं…. काम, विश्वसनीयता और ज़मीनी जुड़ाव से भी प्रभावित होती है। खुद टॉलीवुड के भीतर भी डर और असमंजस है—राजनीति में कदम रखने से करियर, छवि और रचनात्मक आज़ादी पर असर पड़ सकता है। इसलिए हर मुलाक़ात टिकट में बदले, यह तय नहीं।
तो क्या इस बार बंगला फिल्म इंडस्ट्री निर्णायक बनेगी?
संभावनाएं हैं, लेकिन सीमित दायरों में। शहरी सीटों पर असर दिख सकता है, युवाओं और महिला मतदाताओं तक संदेश तेज़ी से पहुंच सकता है। मगर ग्रामीण बंगाल में अब भी संगठन, स्थानीय मुद्दे और ज़मीनी चेहरे ही असली खिलाड़ी रहेंगे।
आगामी चुनाव में टॉलीवुड शायद मुख्य अभिनेता न बने, लेकिन एक प्रभावशाली सह-कलाकार ज़रूर होगा। ममता बनर्जी जिस सियासी स्टूडियो में पहले से सेट और लाइटिंग तैयार कर चुकी हैं, भाजपा अब उसी स्क्रिप्ट में अपनी भूमिका तलाश रही है।
आख़िरकार फैसला जनता के हाथ में होगा— क्या वह स्टार को वोट देगी, या उस कहानी को, जो चुनाव के बाद भी ज़मीनी पर्दे पर चलती रहेगी?




























