पटना का बेऊर जेल एक बार फिर सुर्खियों में है। वजह—पूर्णिया के सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव की एंट्री। सवाल वही पुराना है, लेकिन इस बार दांव बड़े हैं—क्या बेऊर जेल फिर से बाहुबलियों का पावर सेंटर बनेगा? क्या जेल के अंदर भी राजनीतिक और आपराधिक वर्चस्व की जंग छिड़ सकती है?
पूर्णिया से निर्दलीय सांसद पप्पू यादव को 1995 के एक पुराने फर्जीवाड़ा मामले में गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तारी के बाद उन्हें पहले पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल में रखा गया और बाद में कोर्ट के आदेश पर बेऊर जेल शिफ्ट कर दिया गया। सूत्रों के मुताबिक, अगर जमानत प्रक्रिया लंबी खिंचती है तो पप्पू यादव को लंबे समय तक बेऊर जेल में रहना पड़ सकता है। ऐसे में जेल के अंदर का पावर संतुलन चर्चा का विषय बन गया है।
बेऊर जेल का नाम बिहार की राजनीति और अपराध की दुनिया में लंबे समय से चर्चा में रहा है। अतीत में कई बाहुबली नेता और कुख्यात अपराधी इस जेल में बंद रह चुके हैं। पुलिस रिपोर्टों में पहले भी सामने आया है कि पटना और आसपास के इलाकों में रंगदारी और हत्या की साजिशों की डोर जेल के अंदर से जुड़ी रही है। जेल में छापेमारी के दौरान मोबाइल फोन, ड्रग्स और अन्य प्रतिबंधित सामान मिलने की घटनाएं भी सामने आती रही हैं।
पूर्व में राजद विधायक रीतलाल यादव पर जेल से रंगदारी मांगने के आरोप लगे थे, जिसके बाद उन्हें चुनाव से पहले दूसरी जेल में शिफ्ट किया गया था। इसी तरह, कई मामलों में जेल के अंदर से गैंग और राजनीतिक नेटवर्क चलने की आशंकाएं जताई जाती रही हैं। फिलहाल बेऊर जेल में मोकामा के पूर्व जेडीयू विधायक अनंत सिंह बंद हैं। इसके अलावा अतीत में सूरजभान सिंह, आनंद मोहन, मुन्ना शुक्ला और रीतलाल यादव जैसे बाहुबली नेता भी यहां रह चुके हैं। ऐसे में पप्पू यादव की एंट्री के बाद जेल के अंदर वर्चस्व की संभावित लड़ाई की चर्चा तेज हो गई है, हालांकि प्रशासनिक स्तर पर इसे लेकर कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।
जेल प्रशासन के लिए दो हाई-प्रोफाइल नेताओं की मौजूदगी चुनौती बन सकती है। अधिकारियों को सुरक्षा, बैरक व्यवस्था, मुलाकात सिस्टम और संचार पर खास नजर रखनी पड़ सकती है। पप्पू यादव की पहचान एक आक्रामक और जनसंपर्क वाली राजनीति के रूप में रही है। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि अगर वह जेल के अंदर भी सक्रिय रहते हैं तो इसका असर जेल के आंतरिक समीकरण पर पड़ सकता है।
फिलहाल सबकी नजर पप्पू यादव की जमानत प्रक्रिया पर टिकी है। अगर उन्हें जल्द राहत मिलती है तो मामला ठंडा पड़ सकता है।
लेकिन अगर वे लंबे समय तक जेल में रहते हैं तो बेऊर जेल एक बार फिर बिहार की राजनीति और अपराध के संगम का केंद्र बन सकता है।
























