अगर आप रोमांच के शौकीन हैं और अपनी शारीरिक सहनशक्ति की परीक्षा लेना चाहते हैं, तो बुरहानपुर के जिला अस्पताल पधारिए। यहाँ 32 करोड़ की लागत से बनी चमचमाती इमारत आपका स्वागत तो करेगी, लेकिन जरा संभलकर! यहाँ इलाज कम और ‘कसरत’ ज्यादा होती है।
अस्पताल की लिफ्ट को देखकर ऐसा लगता है जैसे उसे किसी तपस्या पर भेजा गया है। गंभीर मरीज और बुजुर्गों के लिए अस्पताल प्रशासन ने अनूठा ‘ट्रेकिंग प्रोग्राम’ शुरू किया है—सीढ़ियां चढ़िए और फेफड़ों को मजबूत कीजिए। हालांकि, सिविल सर्जन साहब का कहना है कि एक लिफ्ट चालू है और दूसरी ‘निर्माण’ के नाम पर विश्राम कर रही है। अब बीमार आदमी सीढ़ियां चढ़ते-चढ़ते ठीक हो जाए या भगवान को प्यारा, यह उसकी किस्मत।
दिल के मरीजों के लिए यहाँ की ईसीजी मशीन किसी रहस्यमयी पहेली से कम नहीं है। कई मरीज जब अपनी धड़कनें चेक कराने पहुँचते हैं, तो मशीन की अपनी ही ‘धड़कन’ रुकी होती है। कभी “मशीन चार्ज नहीं है।” (शायद अस्पताल का बजट बिजली बिल भरने में कम पड़ गया। कभी “स्टाफ मीटिंग में है।” (मरीज की जान से ज्यादा जरूरी चर्चा शायद चाय की प्याली पर हो रही है!)
लेकिन कड़वा सच यह भी है कि 32 करोड़ की बिल्डिंग में ईसीजी मशीन को ‘चार्ज’ करने का जुगाड़ न होना, डिजिटल इंडिया की एक ऐसी तस्वीर है जिसे देख कर दिल सच में बैठ जाए।
अस्पताल में करीब 10 डॉक्टरों के पद खाली पड़े हैं। अब जब डॉक्टर ही नहीं होंगे, तो संसाधन तो शोपीस ही बनेंगे न? अस्पताल की हालत देखकर लगता है कि यहाँ का सिस्टम खुद ‘वेंटिलेटर’ पर है।
सिविल सर्जन डॉ. दर्पण टोके का कहना है कि “जांच करेंगे, समाधान करेंगे और कार्रवाई करेंगे।” यह आश्वासन ठीक वैसा ही है जैसा हर साल मानसून से पहले नालों की सफाई का मिलता है। आश्वासन की घुट्टी पीकर मरीज भले ही ठीक न हों, लेकिन फाइलों का पेट जरूर भर जाता है।
बुरहानपुर जिला अस्पताल यह साबित करने के लिए काफी है कि ईंट-पत्थर और पेंट से अस्पताल नहीं बनते, अस्पताल बनते हैं डॉक्टरों और काम करने वाली मशीनों से। जनता का 32 करोड़ रुपया अगर सीढ़ियां चढ़ने और ‘मशीन खराब है’ सुनने में जा रहा है, तो साहब, इससे अच्छा तो लोग हकीमों के पास ही चले जाएं!


















