मशहूर सिंगर बादशाह के नए गाने ‘टटीरी’ ने एक बार फिर संगीत जगत में विवादों का बवंडर खड़ा कर दिया है। हनी सिंह के विवादित ट्रैक हों या अमर सिंह ‘चमकीला’ की बायोपिक में दिखाए गए डबल मीनिंग गीत—सवाल वही पुराना है, आखिर गानों में ‘गंदी बात’ का ये सिलसिला थम क्यों नहीं रहा?
एक दौर था जब मनोरंजन का साधन सिर्फ मेले, नौटंकी और अखाड़े हुआ करते थे। वहां परोसा जाने वाला ‘एडल्ट कंटेंट’ एक सीमित दायरे तक रहता था। लेकिन 80 के दशक में कैसेट कल्चर ने इसे घर-घर पहुँचाया। 90 के दशक में वॉकमैन ने युवाओं को ‘प्राइवेट स्पेस’ दिया, तो 2000 के बाद सीडी प्लेयर ने अश्लीलता को ‘Visuals की ताकत दे दी।
आज स्मार्टफोन और इंटरनेट के दौर में स्थिति भयावह है। अब गायक कंपनियों के मोहताज नहीं रहे। सस्ती लोकप्रियता और व्यूज की होड़ ने खासकर भोजपुरी और पंजाबी संगीत में अश्लीलता की बाढ़ ला दी है। जो कभी ‘डबल मीनिंग’ था, वह अब ‘पूरा अश्लील’ हो चुका है।
फिल्मी गीतों पर अश्लीलता का आरोप नया नहीं है। साल 1944 में ‘मन की जीत’ फिल्म के गीत ‘मेरो जोबना का देखो उभार’ पर भारी बवाल हुआ था। वहीं 90 का दशक और ‘चोली के पीछे क्या है’ जैसे गीतों ने समाज को दो धड़ों में बांट दिया था। मराठी में दादा कोंडके और हालिया दौर में भोजपुरी सिनेमा इसका बड़ा शिकार बना, जहाँ अश्लीलता के कारण आज दर्शक फिल्मों से दूर हो गए हैं।
यह तर्क देना कि ‘समाज में डिमांड है इसलिए हम बना रहे हैं’, वैसा ही है जैसे ड्रग्स की मांग होने पर उसे कानूनी मान्यता दे दी जाए। यह हमारी आने वाली पीढ़ी के संस्कारों को संक्रमित कर रहा है।
अश्लील गीतों का सबसे बुरा असर भाषा की छवि पर पड़ा है। भोजपुरी की समृद्ध लोक परंपरा को आज बाहरी दुनिया सिर्फ अश्लीलता का पर्याय समझने लगी है। 15 साल पहले आए ‘ए डबल चोटी वाली’ जैसे गीतों ने न केवल बच्चियों के प्रति छेड़खानी को बढ़ावा दिया, बल्कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों के लिए एक ‘कैटलिस्ट’ का काम भी किया।
आज जब गाने सीधे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर रिलीज हो रहे हैं, तो सबसे बड़ी चुनौती सेंसरशिप की है। जिस तरह फिल्मों के लिए बोर्ड है, उसी तरह गानों और OTT के लिए भी सख्त कानून की ज़रूरत है।
डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ऐसी व्यवस्था हो कि यदि कुछ प्रतिशत लोग गाने को रिपोर्ट करें, तो वह तुरंत ब्लॉक हो जाए। कीचड़ को कीचड़ से नहीं धोया जा सकता। अश्लीलता के खिलाफ चर्चा करने से बेहतर है कि ‘अच्छे संगीत’ को बढ़ावा दिया जाए। अश्लील गीतों की उम्र लंबी नहीं होती, लेकिन वे जो सांस्कृतिक घाव देते हैं, उन्हें भरने में सदियां लग जाती हैं। अब समय आ गया है कि समाज और सरकार मिलकर इस ‘ अश्लील डिजिटल प्रदूषण’ पर लगाम लगाएं।

















