पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव का पारा अब सियासी बयानों से ऊपर उठकर पौराणिक युद्ध ‘महाभारत’ की दहलीज तक जा पहुंचा है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सूबे की राजनीति में एक नया ‘धार्मिक नैरेटिव’ सेट करते हुए TMC की तुलना ‘पांडवों’ से और BJP की तुलना ‘कौरवों’ से कर दी है।
पश्चिम बर्धमान के पांडबेश्वर में एक विशाल जनसभा को संबोधित करते हुए ममता बनर्जी ने न केवल केंद्र सरकार पर प्रहार किए, बल्कि चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर भी गंभीर सवाल उठाए।
ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि बीजेपी चुनाव आयोग के साथ मिलकर बंगाल में ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीज़न’ (SIR) के नाम पर खेल कर रही है। उन्होंने दावा किया कि तार्किक विसंगतियों का बहाना बनाकर टीएमसी समर्थकों के नाम मतदाता सूची से काटे जा रहे हैं।
ममता बनर्जी का कहना है कि यह न्याय और अन्याय की लड़ाई है। बीजेपी कौरवों के पक्ष में खड़ी है और टीएमसी पांडवों की तरह धर्म की रक्षा कर रही है। हम उन लोगों को मुफ्त कानूनी सहायता देंगे जिनके नाम साजिश के तहत हटाए गए हैं।”
बीजेपी द्वारा लगाए जा रहे भ्रष्टाचार के आरोपों पर ममता बनर्जी ने अपनी व्यक्तिगत शुचिता का हवाला दिया। उन्होंने कहा, “वे मुझे चोर कहते हैं, जबकि मैंने आज तक सरकारी वेतन का एक रुपया भी नहीं लिया। मैं किसी और के पैसे से खरीदी गई चाय तक नहीं पीती।” उन्होंने नोटबंदी और लॉकडाउन का जिक्र करते हुए पीएम मोदी पर निशाना साधा और कहा कि बीजेपी की राजनीति सिर्फ ‘झूठ और लूट’ पर टिकी है।
ममता बनर्जी का यह बयान महज एक चुनावी जुमला नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। इसके तीन मुख्य कारण दिखते हैं:
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हिंदू विरोधी छवि को तोड़ना: बीजेपी लगातार ममता पर ‘मुस्लिम तुष्टीकरण’ का आरोप लगाती रही है। खुद को ‘पांडव’ बताकर ममता ने बहुसंख्यक हिंदू मतदाताओं को यह संदेश देने की कोशिश की है कि वह और उनकी पार्टी ही असल धर्म के साथ हैं।
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सॉफ्ट हिंदुत्व का सफल मॉडल: इससे पहले 2020 में अरविंद केजरीवाल ने खुद को ‘हनुमान भक्त’ बताकर और 2017 में राहुल गांधी ने ‘जनेऊधारी ब्राह्मण’ के रूप में खुद को पेश कर बीजेपी के हिंदुत्व कार्ड की काट खोजी थी। ममता अब उसी राह पर हैं।
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नैतिक बढ़त: पांडवों को भारतीय जनमानस में ‘सत्य और न्याय’ का प्रतीक माना जाता है। खुद को पांडव बताकर ममता ने बीजेपी को ‘अहंकारी और अत्याचारी’ कौरवों के खांचे में खड़ा कर दिया है।
बंगाल चुनाव अब केवल विकास या रोजगार के मुद्दों पर नहीं, बल्कि ‘अस्मिता’ और ‘प्रतीकों’ की लड़ाई बन चुका है। बीजेपी जहां भगवान राम और बजरंगबली के सहारे चुनावी वैतरणी पार करना चाहती है, वहीं ममता ने ‘महाभारत’ का जिक्र कर इस मुकाबले को और अधिक दिलचस्प बना दिया है। अब देखना यह है कि बंगाल की जनता इस ‘महाभारत’ में किसे अपना ‘सारथी’ चुनती है।















