2005 की वह काली रात, जब जेल की दीवारें ढह गईं, कानून का मखौल उड़ा और संविधान की गरिमा तार-तार हो गई…” बीते 30 मार्च को लोकसभा में गृह मंत्री अमित शाह के संबोधन ने बिहार के एक ऐसे जख्म को कुरेद दिया, जिसने दो दशक पहले पूरे देश को हिला कर रख दिया था। अमित शाह ने जब सदन में नक्सलवाद के खात्मे का रोडमैप रखा, तो जिक्र उस शख्स का भी आया जो ‘जहानाबाद जेल ब्रेक’ का मास्टरमाइंड था।
हैरानी की बात यह है कि कभी जिस नाम से पुलिस और प्रशासन की नींद उड़ जाती थी, वह आज सफेदपोश राजनीति की मुख्यधारा में अपनी जगह तलाश रहा है। यह कहानी है अजय कानू की—एक दौर का खूंखार नक्सली कमांडर और आज का उभरता हुआ राजनीतिक चेहरा।
बिहार में उस वक्त राष्ट्रपति शासन था। 13 नवंबर 2005 की शाम जहानाबाद शहर में रोज की तरह बिजली कटी, लेकिन यह कोई सामान्य कटौती नहीं थी। रात के अंधेरे में पुलिस की वर्दी पहने और ‘पुलिस’ लिखी गाड़ियों में करीब 1000 नक्सली (पीपुल्स लिबरेशन गोरिल्ला आर्मी) शहर में दाखिल हुए।
सुनियोजित तरीके से पहले पुलिस लाइन, आर्मरी और थानों पर हमला किया गया। इसके बाद मुख्य निशाना बनी ‘जहानाबाद जिला जेल’। महज दो-तीन घंटों के भीतर नक्सलियों ने वह कर दिखाया जिसे भारत का सबसे बड़ा जेल ब्रेक कहा जाता है। 389 कैदी फरार हो गए। अजय कानू को आजाद करा लिया गया। नक्सली प्रतिद्वंद्वी ‘रणवीर सेना’ के दो बड़े लीडर, बड़े शर्मा और बिसेश्वर राय समेत 12 लोगों की जेल के भीतर हत्या कर दी गई।
इस हमले की सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि इसका खाका जेल की सलाखों के पीछे ही तैयार हुआ था। 2002 से बंद अजय कानू उर्फ रवि ने जेल के भीतर ही कैदियों का ‘यूनियन’ बना लिया था। क्षमता से अधिक भरे कैदियों की सुविधाओं के नाम पर उसने प्रशासन पर दबाव बनाया और अंदर बैठे-बैठे बाहर अपने संपर्कों के जरिए ऑपरेशन ‘जेल ब्रेक’ को अंजाम दिया।
वक्त का पहिया घूमा और 2007 में अजय कानू फिर गिरफ्तार हुआ। सात साल जेल में काटने के बाद, 2022 में रिहाई हुई तो अजय कानू का अवतार बदला हुआ था। बंदूक छोड़कर उसने ‘लोकतंत्र’ का रास्ता चुना। अजय कानू अब ‘लोकहित अधिकार पार्टी’ के प्रदेश अध्यक्ष हैं। चर्चा है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में उसने आरजेडी से भी टिकट की दावेदारी पेश की थी।
अब वह खुद को गरीबों और वंचितों की आवाज बताते हैं। कानू समुदाय के अधिकारों और बच्चों की शिक्षा की बात करते हैं। उनकी पत्नी शारदा देवी पंचायत चुनाव भी लड़ चुकी हैं। गृह मंत्री अमित शाह ने सदन में साफ कहा कि सुरक्षा बलों की रणनीति और विकास कार्यों से नक्सलवाद अब समाप्ति की कगार पर है। लेकिन अजय कानू जैसे किरदारों का लोकतांत्रिक व्यवस्था में शामिल होना एक बड़ी बहस को जन्म देता है।
क्या खूनी क्रांति का रास्ता छोड़कर राजनीति में आए ये चेहरे वाकई समाज बदल रहे हैं, या यह सिर्फ अतीत के दाग धोने की एक कोशिश है? जवाब भविष्य के गर्भ में है, लेकिन जहानाबाद की वो दीवारें आज भी बिहार की सत्ता की उस सबसे बड़ी नाकामी की गवाही देती हैं।















