भरत भूषण तिवारी का 18 जून को पुलिस ने भोजपुर से 25 किमी दूर बिलौटी गांव में एनकाउंटर किया था. इससे पहले 15 जून को भरत का एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें वो हाथ में पिस्टल लेकर प्रशासन एवं सरकार पर सवाल उठा रहा था. 17 जून को शाहपुर के थाना प्रभारी फोर्स के साथ पहुंचे थे और भरत से जाकर बातचीत की थी. इसके बाद 18 जून को एसटीएफ ने उसे घेर लिया था. पुलिस के मुताबिक भरत ने तीन गोलियां चलाईं थीं.वीडियो में नजर आ रहा है कि भरत ने पुलिस की ओर अपनी पिस्टल फेंक दी थी. इसके बाद उसे गोली मारी गई. इसके बाद अस्पताल ले जाया गया, जहां उसकी मौत हो गई. मामले में आरेापी पुलिस टीम को पहले ही सस्पेंड किया जा चुका है.
इलाहाबाद हाईकोर्ट की अधिवक्ता अंकिता तिवारी के मुताबिक भारतीय कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो सीधे तौर पर अपराधियों की मुठभेड़ का अधिकार देता हो. हालांकि कुछ ऐसे प्रावधान हैं, जिनसे पुलिस अधिकारियों को अपराधियों से निपटने की शक्तियां दी गई हैं. इनमें पहला है आत्मरक्षा. आईपीसी की धारा 96 के तहत आत्मरक्षा के लिए किया गया कोई भी कार्य अपराध नहीं है.
इसी तरह से आईपीसी की धारा 300 में अपवाद 3 जोड़ा है. इसमें कहा गया है कि यदि किसी सरकारी कर्मचारी या उसकी सहायता कर रहा व्यक्ति कानूनी कार्रवाई करता है और उससे किसी की मौत हो जाती है तो उसके पास बचाव का अधिकार है, अगर उसने शांति व्यवस्था कायम रखने के लिए काम किया हो, वह कानून के अनुसार अपना कर्तव्य निभा रहा हो और उसके मन में किसी तरह की व्यक्तिगत दुर्भावना न हो.
इसी तरह सीआरपीसी की धारा 46 में कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति गिरफ्तारी का विरोध करता है, भागने की कोशिश करता है तो पुलिस आवश्यक बल प्रयोग कर सकती है, लेकिन ये मारने का लाइसेंस नहीं है.
सुप्रीम कोर्ट ने एनकाउंटर की गाइडलाइंस जारी की थी?
सुप्रीम कोर्ट ने 2014 में पीपुल्स यूनियन ऑफ सिविल लिबर्टीज की याचिका की सुनवाई करते हुए एनकाउंटर की गाइडलाइंस जारी की थीं. दरअसल PUCL ने 1995 से 1997 के बीच मुंबई में हुए 99 एनकाउंटर की सच्चाई पर सवाल उठाए थे. 23 सितंबर 2014 को तत्कालीन चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया आर एम लोढ़ा और जस्टिस आर एफ नरीमन ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया था. शीर्ष अदालत ने कहा था कि अनुच्छेद 21 के तहत सभी को जीने का अधिकार है. राज्य भी इसका उल्लंघन नहीं कर सकता. कोर्ट ने यह भी कहा था कि मुठभेड़ के नाम पर जो हत्याएं होती हैं उनकी स्वतंत्र तौर पर जांच होनी चाहिए, क्योंकि वे कानून की विश्वसनीयता को प्रभावित करती हैं.
जब भी पुलिस को किसी अपराधी के बारे में जानकारी मिले तो उसे किसी न किसी रूप में लिखित या इलेक्ट्रॉनिक तौर (ऑडियो-वीडियो) पर दर्ज करें.
अगर खूफिया जानकारी के आधार पर मुठभेड़ होती है, जिसे पुलिस गोलीबारी बताती है और किसी की मौत होती है तो इस संबंध में एफआईआर दर्ज की जाए और उसे बिना देरी कोर्ट भेजा जाए.
मुठभेड़ की स्वतंत्र जांच सीआईडी या किसी अन्य पुलिस स्टेशन की टीम से कराई जानी चाहिए, जिसमें एनकाउंटर करने वाले पुलिस अधिकारी से एक रैंक ऊपर का अफसर हो.
एनकाउंटर की रंगीन तस्वीरें ली जानी चाहिए. एनकाउंटर से साक्ष्यों को इकट्ठा करना चाहिए, घटनास्थल पर मौजूद गवाहों की पहचान और उनके नाम दर्ज करने चाहिए.
जिला अस्पताल में कम से कम दो डॉक्टर पोस्टमार्टम करें, इसकी वीडियोग्राफी हो. बंदूक, गोलियों के खोल जैसे साक्ष्य इकट्ठे किए जाने चाहिए.
पुलिस फायरिंग में होने वाली सभी मौतों के मामले में सीआरपीसी की धारा 176 के तहत न्यायिक जांच होनी चाहिए. इसकी रिपोर्ट अधिकार क्षेत्र वाले न्यायिक मजिस्ट्रेट को भेजा जाए.
निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच पर शक हो तो राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की भागीदारी आवश्यक है. बिना किसी देरी के मानवाधिकार आयोग को रिपोर्ट भेजी जानी चाहिए.
पुलिस की गोली से कोई घायल हुआ है तो उसे तुरंत अस्पताल में भर्ती कराना चाहिए, मजिस्ट्रेट या चिकित्सा अधिकारी के सामने उसके बयान दर्ज होने चाहिए.
घटना की पूरी जांच के बाद न्यायालय को रिपोर्ट भेजी जानी चाहिए. जांच अधिकारी द्वारा आरोप पत्र जल्द से जल्द दाखिल किया जाना चाहिए.
पुलिस फायरिंग में हुई मौतों के सभी मामलों की रिपोर्ट डीजीपी और एनएचआरसी को भेजी जानी चाहिए.
एनकाउंटर की जांच के दौरान संबंधित पुलिस वाले के प्रमोशन पर रोक रहे और उसे किसी तरह का पुरस्कार न दिया जाए.
अगर एनकाउंटर फर्जी साबित हो तो पीड़ित परिवार को मुआवजा मिले और आरोपी पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई की जाए.
