आज कनाडा की गलियों में घूमें तो ऐसा लगता है जैसे पंजाब के किसी शहर में आ गए हों। राजनीति हो, बिजनेस हो या खेती—कनाडा के हर कोने पर भारतीयों, खासकर पंजाबियों का दबदबा है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ‘सात समंदर पार’ के इस बर्फीले देश में सबसे पहले कदम रखने वाला वह ‘शूरवीर’ कौन था? आज कहानी उस शख्स की, जिसने न सिर्फ कनाडा में पहला भारतीय कदम रखा, बल्कि लाखों भारतीयों के लिए सुनहरे भविष्य की नींव भी रखी।
बात साल 1897 की है। ब्रिटिश साम्राज्य की महारानी विक्टोरिया की ‘डायमंड जुबली’ का जश्न लंदन में मनाया जा रहा था। इस खास मौके के लिए ब्रिटिश भारतीय सेना के बेहतरीन सैनिकों की एक टुकड़ी चुनी गई। इस दल की कमान संभाल रहे थे रिसालदार मेजर केसर सिंह, जो 25वीं कैवेलरी (फ्रंटियर फोर्स) के जांबाज अफसर थे।
यह दल हांगकांग से समुद्री जहाज के जरिए लंदन के लिए रवाना हुआ। सफर का रास्ता कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया प्रांत से होकर गुजरता था। शायद कुदरत ने केसर सिंह के लिए कुछ और ही सोच रखा था। जब वे वैंकूवर के तट पर उतरे, तो वहां की आबोहवा ने उनके दिल में घर कर लिया।
मई 1897 में जब केसर सिंह ‘एम्प्रेस ऑफ इंडिया’ जहाज से वैंकूवर पहुंचे, तो वहां के लोग हैरान रह गए। उनकी शानदार वर्दी और सिर पर सजा पारंपरिक साफा (पगड़ी) कनाडाई लोगों के लिए कौतूहल का विषय था। जहाँ बाकी सैनिक लंदन का समारोह खत्म कर भारत लौटने की तैयारी में थे, केसर सिंह ने जोखिम भरा रास्ता चुना। उन्होंने देखा कि कनाडा की जमीन पंजाब की तरह ही उपजाऊ और संभावनाओं से भरी है।
उन्होंने फौज की सुरक्षित नौकरी और वतन की यादों के बीच एक साहसिक फैसला लिया कनाडा में ही रुकने का। यह फैसला आसान नहीं था। न कोई जान-पहचान थी, न कोई सहारा। पास में थी तो बस अपनी मेहनत पर यकीन और कुछ कर गुजरने का जज्बा।
शुरुआत बेहद संघर्षपूर्ण रही। केसर सिंह ने लकड़ी की मिलों (Saw Mills) में कड़ा शारीरिक श्रम किया। हाड़ कंपाने वाली ठंड और अजनबी माहौल में उन्होंने खुद को ढाला। धीरे-धीरे उन्होंने खेती शुरू की और सफलता के झंडे गाड़ दिए।
उन्होंने पंजाब के अपने गांव चिट्ठियां लिखीं और वहां के युवाओं को बताया कि इस नई धरती पर मेहनत करने वालों के लिए अवसरों का समंदर है। केसर सिंह सिर्फ वहां बसे नहीं, बल्कि उन्होंने नए आने वाले भारतीयों के लिए रहने और काम का इंतजाम भी किया।
आज केसर सिंह का नाम इतिहास के सुनहरे अक्षरों में दर्ज है। 1997 में जब उनके कनाडा आगमन के 100 साल पूरे हुए, तो कनाडा सरकार ने उनके सम्मान में विशेष डाक टिकट जारी किया। ब्रिटिश कोलंबिया की संसद में आज भी उनकी दूरदर्शिता की मिसाल दी जाती है।
आज जब भी कोई भारतीय वैंकूवर या टोरंटो की धरती पर उतरता है, तो उसके पीछे रिसालदार मेजर केसर सिंह की वही 129 साल पुरानी हिम्मत होती है। अगर उस दिन केसर सिंह ने वो जोखिम न लिया होता, तो शायद आज कनाडा ‘मिनी पंजाब’ न कहलाता।














