उत्तर प्रदेश की राजनीति में ‘गाजीपुर का फाटक‘ (मुख्तार अंसारी का निवास) दशकों से सत्ता का केंद्र रहा है। लेकिन पहली बार इस किले की दीवारें अंदर से दरकती नजर आ रही हैं। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले, मुख्तार के भतीजे सलमान अंसारी ने अपने ही भाई और समाजवादी पार्टी से विधायक सुहैब अंसारी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। आइए समझते हैं इस विवाद के पीछे की असली कहानी क्या है।
यह पूरा मामला तब शुरू हुआ जब सलमान अंसारी (पूर्व विधायक सिबगतुल्लाह अंसारी के बड़े बेटे) ने सोशल मीडिया पर एक विस्फोटक पोस्ट लिखा। उन्होंने अपने ही भाई, मोहम्मदाबाद से सपा विधायक सुहैब उर्फ मन्नू अंसारी पर गंभीर आरोप लगाए। सलमान ने साफ कहा कि पिछले 4 सालों से वह अपनी विधानसभा क्षेत्र इसलिए नहीं जा रहे क्योंकि वह वहाँ हो रही “लूट और बदतमीजी“ का हिस्सा नहीं बनना चाहते।
सलमान ने केवल नाराजगी नहीं जताई, बल्कि भ्रष्टाचार के आंकड़े भी सामने रखे। आरोप है कि जो स्ट्रीट लाइट 30,000 की आती है, उसे कागजों पर 1.5 लाख का दिखाया गया। विधायक निधि के करीब 20 करोड़ के बजट में भारी अनियमितता और बंदरबांट का आरोप है। सलमान का दावा है कि उनके पिता और चाचा मतलब मुख्तार और अफजाल के पुराने वफादार कार्यकर्ताओं को बेइज्जत किया जा रहा है।
स्टोरी में सबसे चौंकाने वाला मोड़ तब आया जब सलमान ने आरोप लगाया कि क्षेत्र की जनता और कार्यकर्ताओं को “राष्ट्रीय अध्यक्ष” (अखिलेश यादव) के नाम पर धमकाया जाता है। उनसे कहा जाता है कि अगर कुछ बोला, तो उन्हें पार्टी से बाहर निकलवा दिया जाएगा। यह सीधा संकेत है कि अंदरूनी कलह अब समाजवादी पार्टी के नेतृत्व तक पहुँच सकती है।
इस विवाद को समझने के लिए परिवार के समीकरण को जानना जरूरी है:
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मुख्तार अंसारी: परिवार का सबसे रसूखदार चेहरा (बांदा जेल में 2024 में मृत्यु)।
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अफजाल अंसारी: मुख्तार के भाई और वर्तमान सांसद।
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सिबगतुल्लाह अंसारी: मुख्तार के बड़े भाई (2 बार के पूर्व विधायक)।
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सुहैब (मन्नू) अंसारी: सिबगतुल्लाह के छोटे बेटे और वर्तमान विधायक (जिन पर आरोप लगे हैं)।
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सलमान अंसारी: सिबगतुल्लाह के बड़े बेटे (जिन्होंने बगावत की है)।
यह बगावत समाजवादी पार्टी और अंसारी परिवार के लिए ‘टाइम बम‘ की तरह है। बीजेपी को अब बैठे-बिठाए भ्रष्टाचार का मुद्दा मिल गया है। वो इसे “परिवारवाद और भ्रष्टाचार” का क्लासिक उदाहरण बताएगी। ‘फाटक’ की पहचान हमेशा एकजुटता की रही है। आपसी फूट से उनके कोर मुस्लिम और दलित वोट बैंक में भ्रम पैदा हो सकता है। वहीं 2027 में टिकट वितरण के समय यह विवाद और गहरा सकता है।
सलमान अंसारी ने अपनी पोस्ट के अंत में लिखा— “हम कोई राजा नहीं हैं जो मेरी विधानसभा को अपनी प्रजा समझें। जनता कभी भी राजा का भूत उतार सकती है।” यह बयान सीधा इशारा है कि परिवार के भीतर ही एक धड़ा अब सुहैब की कार्यशैली से बेहद खफा है।
यह सिर्फ दो भाइयों की लड़ाई नहीं है, बल्कि उस विरासत पर कब्जे की जंग है जिसे मुख्तार अंसारी ने सालों तक संभाला था। क्या ‘फाटक’ इस दरार को भर पाएगा, या 2027 में मोहम्मदाबाद का सियासी नक्शा बदल जाएगा?





















