दिल्ली के प्रतिष्ठित ILBS में गरीबों के इलाज में हो रही कथित अनदेखी अब कानूनी घेरे में है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली सरकार और ILBS प्रशासन को नोटिस जारी कर कड़ा जवाब तलब किया है। कोर्ट ने पूछा है कि शत-प्रतिशत सरकारी वित्त पोषित होने के बावजूद इस अस्पताल को ‘प्राइवेट स्टाइल’ में क्यों चलाया जा रहा है?
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति डी.के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की पीठ ने गैर-सरकारी संगठन ‘सोशल जूरिस्ट’ की याचिका पर यह कदम उठाया। याचिका में चौंकाने वाले आंकड़े पेश किए गए हैं। आंकड़ों के मुताबिक 90% बेड केवल पैसे देने वाले अमीर मरीजों के लिए आरक्षित हैं। IPD (भर्ती) में ईडब्ल्यूएस (EWS) वर्ग के लिए सिर्फ 10% कोटा। OPD में भी गरीब मरीजों के लिए केवल 25% की सीमा तय। 75% ओपीडी मरीज वे हैं जो मोटा भुगतान कर सुपरस्पेशलिटी सुविधाओं का लाभ उठाते हैं।
वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक अग्रवाल ने कोर्ट में दलील देते हुए कहा कि ILBS का मालिकाना हक दिल्ली सरकार के पास है और इसका पूरा फंड जनता के टैक्स से आता है। यह पूरी तरह असंवैधानिक है। किसी भी सरकारी अस्पताल में इलाज की ऐसी सीमाएं तय नहीं की जा सकतीं। यह नीति भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता) और अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) का खुला उल्लंघन है। देश में ऐसा कोई और सरकारी संस्थान नहीं है जहाँ गरीबों को धक्के खाने पड़ें और अमीरों के लिए रेड कार्पेट बिछा हो।
ILBS को लिवर की गंभीर बीमारियों जैसे हेपेटाइटिस, सिरोसिस और लिवर कैंसर के इलाज के लिए एक विशेष सरकारी केंद्र के रूप में स्थापित किया गया था। याचिकाकर्ता का आरोप है कि अस्पताल अपनी मौजूदा नीतियों के कारण एक सरकारी संस्थान के बजाय ‘प्राइवेट हेल्थकेयर इंस्टीट्यूशन’ की तरह व्यवहार कर रहा है, जहाँ इलाज की पहुंच केवल सक्षम वर्ग तक सीमित होकर रह गई है।
दिल्ली हाईकोर्ट के इस नोटिस के बाद अब दिल्ली सरकार और ILBS प्रशासन को कोर्ट में अपना पक्ष रखना होगा। क्या सरकार अपनी नीतियों में बदलाव करेगी या इस ‘प्राइवेट मॉडल’ का बचाव करेगी? सबकी नज़रें अब सरकार के जवाब पर टिकी हैं।















