उत्तर प्रदेश की सियासत में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले हलचल तेज हो गई है। बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती ने समाजवादी पार्टी के साथ संभावित गठबंधन की खबरों को सिरे से खारिज करते हुए साफ कर दिया है कि बसपा आगामी चुनाव अकेले दम पर लड़ेगी और सरकार बनाएगी।
राजधानी लखनऊ में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में मायावती ने कहा कि गठबंधन की चर्चाएं बसपा को कमजोर करने की साजिश हैं। उनका दावा है कि पिछली बार के अनुभव बताते हैं कि गठबंधन से पार्टी को नुकसान हुआ है, इसलिए इस बार किसी भी दल के साथ हाथ मिलाने का सवाल ही नहीं उठता।
मायावती ने कहा, “सपा, कांग्रेस और बीजेपी – तीनों ही दल अंबेडकर विरोधी मानसिकता रखते हैं और बसपा को कमजोर करने के लिए दुष्प्रचार कर रहे हैं।” उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं से अपील की कि वे अफवाहों से सतर्क रहें और संगठन को मजबूत करें। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि बसपा का फोकस दलित, पिछड़े, अल्पसंख्यक और सर्वसमाज को साथ लेकर बहुमत की सरकार बनाने पर है।
सियासी चर्चा तब तेज हुई जब समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने बयान दिया कि बसपा के साथ रिश्ते बेहतर हो रहे हैं और भविष्य में और मजबूत हो सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि गठबंधन से “पीडीए” (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) की संभावनाएं मजबूत होंगी।
अखिलेश ने ऐतिहासिक उदाहरण देते हुए कहा कि डॉ. भीमराव अंबेडकर और डॉ. राम मनोहर लोहिया ने भी सामाजिक बदलाव के लिए साथ काम किया था, वहीं मुलायम सिंह यादव और कांशीराम का गठबंधन भी मिसाल रहा है। हालांकि, इतिहास गवाह है कि ये गठबंधन लंबे समय तक टिक नहीं पाए।
अखिलेश के इस बयान के बाद यह अटकलें लगाई जाने लगीं कि क्या 2019 जैसा सपा-बसपा गठबंधन फिर देखने को मिल सकता है? लेकिन मायावती ने इन अटकलों पर पूर्ण विराम लगा दिया है।
गठबंधन की चर्चाओं पर भारतीय जनता पार्टी ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी है। प्रदेश की Bharatiya Janata Party ने 1995 के चर्चित ‘गेस्ट हाउस कांड’ की याद दिलाते हुए सपा-बसपा रिश्तों पर सवाल उठाए। योगी सरकार के मंत्री धर्मपाल सिंह ने इसे अवसरवादी राजनीति करार देते हुए कहा कि जनता सब जानती है और ऐसे गठबंधन सिर्फ सत्ता के लिए होते हैं।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में बसपा, सपा और बीजेपी तीनों की अपनी-अपनी सामाजिक पकड़ है। 2027 के चुनाव से पहले यह स्पष्ट हो गया है कि बसपा किसी भी प्रकार के प्री-पोल गठबंधन के मूड में नहीं है। अब सवाल यह है कि क्या बसपा अकेले दम पर पुरानी ताकत हासिल कर पाएगी, या फिर चुनावी समीकरण आखिरी वक्त में कोई नया मोड़ लेगा? फिलहाल मायावती के ऐलान ने इतना जरूर साफ कर दिया है कि 2027 का चुनावी मैदान त्रिकोणीय मुकाबले की ओर बढ़ता दिख रहा है।

























