कोलकाता के चर्चित अस्पताल आरजी कर मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में कथित टेंडर घोटाले की गूंज अब चुनावी मैदान तक पहुंच चुकी है। जांच एजेंसी ED की चार्जशीट में किए गए दावों ने सियासी पारा चढ़ा दिया है। विपक्ष इसे “स्वास्थ्य तंत्र में संगठित भ्रष्टाचार” बता रहा है, जबकि सत्ताधारी TMC इसे राजनीतिक साजिश करार दे रही है। आईए आपको बताते हैं क्या है पूरा मामला
जांच एजेंसियों के मुताबिक, तत्कालीन प्रिंसिपल डॉ. संदीप घोष पर आरोप है कि उन्होंने अस्पताल और कॉलेज से जुड़े करोड़ों रुपये के ठेके कथित तौर पर “पसंदीदा” ठेकेदारों को दिलवाए। इस मॉडल को जांच में ‘गुंडा टेंडर सिस्टम’ कहा गया है—जहां बाहर की कंपनियों को मौका ही नहीं मिलता था और बोली प्रक्रिया पहले से तय रहती थी।
एक अंग्रेजी अखबार की रिपोर्ट के हवाले से ED का दावा है कि कई ठेकों के बदले 10–15% तक नकद कमीशन लिया गया। करीब 6.89 करोड़ रुपये के ठेकों में लगभग 70 लाख रुपये की रिश्वत ली गई। रकम को “प्रोफेशनल फीस” के नाम पर बैंक खातों में जमा कराया गया। कई फर्जी कंपनियां बनाकर टेंडर प्रक्रिया को नियंत्रित किया गया। टेंडर को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटकर नियमों से बचा गया। मेडिकल उपकरण मार्केट रेट से अधिक रेट पर खरीदे गए।
ED ने यह भी आरोप लगाया कि नॉन-प्रैक्टिसिंग पद पर होने के बावजूद डॉ. घोष ने चार निजी क्लीनिकों में सेवाएं दीं और ठेकेदारों से मिली रकम को क्लीनिक की आय दिखाकर लीगल बनाया गया। बाद में यह रकम परिवार के खातों में ट्रांसफर कर संपत्ति खरीद में इस्तेमाल होने का दावा किया गया है।
विपक्ष, खासकर BJP ने आरोप लगाया है कि इस पूरे नेटवर्क को “TMC के करीबी लोगों” का संरक्षण प्राप्त था। BJP नेताओं का दावा है कि बिना राजनीतिक आशीर्वाद के इतने बड़े स्तर पर टेंडर नियंत्रण और कमीशनखोरी संभव नहीं। विपक्ष का आरोप है कि आरोपी अधिकारी TMC के प्रभावशाली गुट से जुड़े थे। ठेकेदारों का नेटवर्क सत्ताधारी दल के स्थानीय नेताओं के करीब माना जाता रहा।
स्वास्थ्य विभाग में “कट-मनी संस्कृति” का यह एक और उदाहरण है। हालांकि, TMC ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि पार्टी का किसी भी व्यक्ति के निजी कृत्य से कोई लेना-देना नहीं है और कानून अपना काम कर रहा है।
राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सरकार पर विपक्ष लगातार हमलावर है। चुनावी रैलियों में यह मुद्दा जोर-शोर से उठाया जा रहा है। विपक्ष इसे “बंगाल मॉडल में भ्रष्टाचार” का प्रतीक बता रहा है, जबकि TMC का कहना है कि ED का इस्तेमाल राजनीतिक हथियार के रूप में किया जा रहा है।
यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब राज्य में चुनावी माहौल गरमा रहा है। स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ा मुद्दा सीधे आम लोगों को प्रभावित करता है। सवाल उठ रहे हैं कि
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क्या सरकारी अस्पतालों में पारदर्शिता सुनिश्चित हो पाएगी?
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क्या कथित ‘गुंडा टेंडर सिस्टम’ पर लगाम लगेगी?
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क्या यह मुद्दा चुनाव में वोटिंग पैटर्न बदल सकता है?
राजनीतिक एक्सपर्टों का मानना है कि अगर आरोपों में दम साबित हुआ तो यह टीएमसी के लिए बड़ा झटका हो सकता है। वहीं, अगर आरोप राजनीतिक साबित हुए तो यह विपक्ष की रणनीति पर भी सवाल खड़े करेगा।
आरजी कर घोटाला अब सिर्फ एक संस्थान का मामला नहीं रहा—यह बंगाल की राजनीति में “भ्रष्टाचार बनाम साजिश” की बड़ी बहस में बदल चुका है। अब देखना होगा कि अदालत और जांच एजेंसियों की अगली कार्रवाई चुनावी समीकरणों को किस दिशा में मोड़ती है।
नोट: ED के आरोप चार्जशीट का हिस्सा हैं। आरोपियों और संबंधित पक्षों ने अदालत में इन दावों को चुनौती देने की बात कही है। अंतिम सत्य न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही तय होगा।





















