पश्चिम बंगाल की सियासी बिसात पर इस वक्त शह और मात का खौफनाक खेल जारी है। एक तरफ दिल्ली की सत्ता पर काबिज बीजेपी ने ममता सरकार की जड़ें हिलाने के लिए अपनी पूरी ‘पलटन’ उतार दी है, तो दूसरी तरफ चुनावी पंडितों के अनुमान विरोधियों की नींद उड़ा रहे हैं। सर्वे चिल्ला-चिल्लाकर कह रहे हैं कि ‘दीदी’ चौथी बार सत्ता के सिंहासन पर बैठने की तैयारी कर चुकी हैं।
लेकिन सवाल यह नहीं है कि ममता जीतेंगी या नहीं, सवाल यह है कि आखिर ममता के पास वो कौन सा ‘ब्रह्मास्त्र’ है जिससे टकराकर बीजेपी के बड़े-बड़े सूरमा ढेर हो जाते हैं? इसका जवाब है— ममता बनर्जी की ‘साइलेंट लेडी ब्रिगेड’। यह महज एक राजनीतिक दल नहीं, बल्कि दीदी का वो अभेद्य सुरक्षा कवच है जिसने बंगाल को एक ‘अजेय दुर्ग’ बना दिया है।
ममता बनर्जी की असली ताकत उनका महिला वोट बैंक तो है ही, लेकिन उनकी असली ‘कमांडो’ वो महिला नेता हैं जो सड़क से लेकर संसद तक आग उगलती हैं। टीएमसी में महिलाओं की भागीदारी सिर्फ दिखावा नहीं है; जहाँ दूसरे दल महिला आरक्षण पर बहस करते हैं, वहीं दीदी 40% टिकट महिलाओं की झोली में डालकर विरोधियों को चित कर देती हैं।
इस स्क्वाड की सबसे अनुभवी सिपहसालार हैं चंद्रिमा भट्टाचार्य। 70 साल की उम्र में भी चंद्रिमा की राजनीतिक पकड़ लोहे जैसी मजबूत है। वित्त और भूमि जैसे भारी-भरकम मंत्रालय संभालने वाली चंद्रिमा, सिंगुर-नंदीग्राम के दौर से ही दीदी की परछाईं बनकर साथ खड़ी हैं। हार हो या जीत, ममता का भरोसा उन पर कभी कम नहीं हुआ, और यही वफादारी इस ब्रिगेड की सबसे बड़ी जान है।
इस ‘महिला सेना’ में डॉ. शशि पांजा का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। एक तरफ वो पेशे से डॉक्टर हैं, तो दूसरी तरफ राजनीति की नब्ज पहचानने वाली माहिर खिलाड़ी। ‘कन्याश्री’ जैसी योजनाओं को बंगाल के घर-घर तक पहुँचाकर उन्होंने ममता को हर बेटी की ‘अभिभावक’ बना दिया है।
वहीं, बारासात की सांसद काकोली घोष दस्तीदार अपनी प्रखर आवाज से जब संसद में गरजती हैं, तो दिल्ली के गलियारे हिल जाते हैं। यूथ कांग्रेस के संघर्ष भरे दिनों से ममता के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाली काकोली ने साबित किया है कि दीदी का साथ छोड़ना उनके खून में नहीं है।
इस ब्रिगेड में डोला सेन की भूमिका एक ‘रणनीतिकार’ की है, जो ट्रेड यूनियन के जरिए मजदूरों और जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच ममता का खौफ और प्यार दोनों बरकरार रखती हैं।
सिर्फ पुराने चेहरे ही नहीं, ममता ने अपनी फौज में बिरबाहा हांसदा जैसी नई और तेजतर्रार ‘रणचंडियों’ को भी शामिल किया है। संथाली फिल्म इंडस्ट्री से निकलकर राजनीति के मैदान में उतरीं बिरबाहा आज आदिवासी समाज में ममता की सबसे बड़ी ढाल हैं।
वहीं कृष्णा चक्रवर्ती जैसी नेत्री ममता के साथ उस वक्त से हैं जब राजनीति में ‘दीदी’ का सफर शुरू ही हुआ था। चाहे जांच एजेंसियों का शिकंजा हो या बीजेपी का ‘ऑपरेशन लोटस’, ममता की ये शेरनियाँ हर हमले को अपने ऊपर झेल लेती हैं ताकि उनकी ‘दीदी’ तक आंच न आए।
यही वो ‘महिला कार्ड’ है जिसके आगे बीजेपी की सारी मशीनरी और रणनीतियाँ फेल नजर आ रही हैं। बंगाल के चुनावी समर में ये महिलाएं सिर्फ प्रत्याशी नहीं, बल्कि ममता बनर्जी के उस ‘स्वाभिमान’ की रक्षक हैं जो कहता है— ‘खेला होबे’ और जीत भी दीदी की ही होगी!














