एक तरफ देश “डिजिटल इंडिया” का सपना जी रहा है, तकनीक नई ऊंचाइयों को छू रही है, वहीं दूसरी ओर झारखंड की राजधानी रांची से महज 50 किलोमीटर दूर खूंटी जिले का बलंगा गांव आज भी अंधेरे से जूझ रहा है। यह अंधेरा सिर्फ बिजली का नहीं है, यह अंधेरा है उपेक्षा का, वादों के टूटने का और विकास की दौड़ में पीछे छूट जाने का।
झारखंड के एक हिंदी अखबार में छपी खबर के अनुसार मरहू प्रखंड में बसे बलंगा गांव में जैसे ही सूरज ढलता है, पूरा इलाका सन्नाटे में डूब जाता है। आजादी के 78 साल बाद भी यहां बिजली नहीं पहुंच पाई। गांव के बुजुर्ग कहते हैं— “जब से होश संभाला है, तब से यही सुनते आए हैं कि बिजली आएगी। देश आजादी के अमृत काल में है, लेकिन हमारे हिस्से में आज भी अंधेरा ही है।”
गांव के आसपास के सभी इलाकों में सालों पहले बिजली पहुंच चुकी है, लेकिन बलंगा मानो नक्शे और योजनाओं के बीच कहीं गुम हो गया। आज भी यहां लालटेन, टॉर्च और मोबाइल की कमजोर रोशनी ही रात का सहारा है। जिन घरों में पैसे देकर कनेक्शन लगवा लिया गया, वहां बल्ब जल उठा, लेकिन जो 300–400 रुपये नहीं दे पाए, उनके हिस्से में अंधेरा ही रह गया। उज्ज्वला जैसी “मुफ्त” योजनाएं भी यहां कीमत मांगती दिखती हैं।
साल 2018 में सरकारी मंचों से घोषणा हुई थी—देश का हर गांव रोशन हो चुका है। लेकिन बलंगा गांव उन दावों की स्याही पर सवाल बनकर खड़ा है। नियम कहते हैं कि अगर किसी गांव के 10 फीसदी घरों या किसी एक सार्वजनिक भवन में बिजली पहुंच जाए, तो गांव कागजों में रोशन मान लिया जाता है। यही वजह है कि फाइलों में बलंगा चमक रहा है, लेकिन हकीकत में आदिवासी टोलों और पहाड़ी इलाकों तक न तार पहुंचे हैं, न खंभे।
बिजली के अभाव ने यहां की जिंदगी को और कठिन बना दिया है। कभी महीने में 3 लीटर मिलने वाला मिट्टी का तेल अब 1 लीटर तक सिमट गया है, और उसके भी बंद होने की आशंका है। रात में महिलाएं लालटेन की मद्धिम रोशनी या मोबाइल की टॉर्च में खाना बनाती हैं। कई परिवारों के लिए तो पेंसिल बैटरी वाली लाइट ही एकमात्र सहारा है।
पानी की कहानी भी अलग नहीं। गांव में सोलर मोटर है, लेकिन वह धूप की मेहरबानी पर चलती है। बादल आते ही पानी बंद। तब महिलाएं कई किलोमीटर दूर प्राकृतिक जल स्रोत “डांड़ी” तक पैदल जाने को मजबूर होती हैं—हाथों में बर्तन, आंखों में थकान और मन में लाचारी।
कई बार उम्मीदें जगाई गईं—“क्रिसमस तक बिजली आ जाएगी,” फिर कहा गया—“नए साल में गांव रोशन होगा।” लेकिन क्रिसमस भी गुजर गया, नया साल भी, और बलंगा आज भी उसी अंधेरे में खड़ा है।
विडंबना देखिए—गांव के सरकारी प्राथमिक स्कूल में स्मार्ट टीवी लगा है। पूरी वायरिंग हो चुकी है, लेकिन बिजली नहीं होने के कारण वह सिर्फ एक शोपीस बनकर रह गया है। स्कूल निगरानी समिति के अध्यक्ष बताते हैं कि कई बच्चे पढ़ाई छोड़ रहे हैं। बिजली की कमी, अभिभावकों में जागरूकता का अभाव और नशाखोरी की बढ़ती संस्कृति—सब मिलकर बच्चों के भविष्य को अंधेरे में धकेल रहे हैं।
बलंगा गांव की कहानी किसी एक गांव की नहीं है। यह आजादी के अमृत काल में विकास के दावों पर खड़ा एक सवाल है। यह कहानी बिजली के खंभों से ज्यादा उस पहली रोशनी की है, जो सच में जिंदगी बदलती है—जो बच्चों की आंखों में सपने जगाए, महिलाओं के हाथों से बोझ कम करे और बुजुर्गों को यह भरोसा दे कि वे आजाद भारत में सचमुच रोशनी के हकदार हैं।
बलंगा आज भी इंतजार कर रहा है…
सिर्फ बिजली का नहीं,
न्याय का, बराबरी का और उस वादे का
जो आजादी के साथ किया गया था।



































