जनवरी 2026 में ईरान में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए, जहां आर्थिक संकट और दमन के खिलाफ लोग सड़कों पर उतरे। ट्रंप ने शुरुआत में सख्त रुख अपनाया। उन्होंने ट्रुथ सोशल पर लिखा कि ईरानी प्रदर्शनकारियों को “हेल्प इज ऑन इट्स वे” है और अगर दमन बढ़ा तो अमेरिका “बहुत मजबूत” कार्रवाई करेगा। उन्होंने ईरान के साथ बैठक की संभावना जताई, लेकिन अगर हत्याएं जारी रहीं तो सैन्य हस्तक्षेप की धमकी दी।ट्रंप प्रशासन ने ईरान पर दबाव बढ़ाया। 2025 में अमेरिका और इज़राइल ने ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमले किए, जिससे ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम कई साल पीछे चला गया। ईरान के मिसाइल स्टॉक और एयर डिफेंस सिस्टम को भारी नुकसान पहुंचा। इसके बावजूद ईरान ने 2,000 से ज्यादा बैलिस्टिक मिसाइलें बरकरार रखीं, जो पहाड़ों में छिपी हैं और बड़े पैमाने पर लॉन्च होने पर अमेरिकी-इज़राइली डिफेंस को चकमा दे सकती हैं। ईरान की प्रॉक्सी फोर्सेस (हिजबुल्लाह, हूती) कमजोर हुईं, लेकिन उसकी असममित युद्ध क्षमता (मिसाइल, ड्रोन, साइबर) बनी रही।

ट्रंप ने 13-14 जनवरी 2026 को सलाहकारों से मीटिंग की, जहां सैन्य विकल्प (स्ट्राइक्स, साइबर अटैक) पर विचार हुआ। कुछ अमेरिकी बेस से पर्सनल निकाले गए, जिससे हमले की आशंका बढ़ी। लेकिन 15-16 जनवरी को ट्रंप ने पीछे हटते हुए कहा कि ईरान ने हत्याएं रोकी हैं और एक्जीक्यूशन प्लान नहीं है। उन्होंने ईरान को “धन्यवाद” तक दिया कि 800+ राजनीतिक कैदियों की फांसी रद्द की गई।क्या ईरान की ताकत कारण थी? आंशिक रूप से हां। ईरान की मिसाइल क्षमता, रिटेलिएशन की धमकी (अमेरिकी बेस पर अटैक), और 2025 के हमलों के बाद भी रिकवरी ने ट्रंप को बड़ा युद्ध टालने पर मजबूर किया। ट्रंप “मैक्सिमम प्रेशर” पॉलिसी पर कायम हैं, लेकिन पूर्ण युद्ध से बचना चाहते हैं क्योंकि इससे तेल कीमतें बढ़ सकती हैं और अमेरिकी हितों को नुकसान हो सकता है।ट्रंप ने डिप्लोमेसी और सैंक्शंस का रास्ता चुना, लेकिन ईरान की सैन्य ताकत ने उन्हें “कैलकुलेटेड” स्टेप्स लेने पर विवश किया। ईरान की “स्ट्रैटेजिक रेसिलिएंस” ने ट्रंप को पीछे खींचने में भूमिका निभाई, लेकिन यह स्थायी नहीं – भविष्य में अगर ईरान न्यूक्लियर रिबिल्ड करे तो ट्रंप फिर हमला कर सकते हैं।


























