उत्तर कोरिया एक बार फिर मानवाधिकारों के गंभीर उल्लंघन के आरोपों को लेकर वैश्विक आलोचना के केंद्र में है। एमनेस्टी इंटरनेशनल की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि तानाशाह किम जोंग उन के शासन में विदेशी मनोरंजन देखने या सुनने पर न सिर्फ वयस्कों, बल्कि स्कूली बच्चों तक को मौत की सज़ा दी जा रही है।
रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर कोरिया में दक्षिण कोरियाई ड्रामा, वेब सीरीज़ और K-Pop संगीत देखना या सुनना “राज्य विरोधी अपराध” माना जाता है। दावा किया गया है कि यांगगांग प्रांत में कुछ हाई स्कूल छात्रों को सिर्फ इसलिए सार्वजनिक रूप से फांसी दे दी गई क्योंकि उन्होंने लोकप्रिय वेब सीरीज़ ‘स्क्वीड गेम’ देखी थी और दक्षिण कोरिया का पॉप म्यूजिक सुना था।
एमनेस्टी इंटरनेशनल का कहना है कि यह घटनाएं अलग-थलग नहीं हैं, बल्कि युवाओं में डर पैदा करने के लिए की जा रही सुनियोजित कार्रवाइयों का हिस्सा हैं। रिपोर्ट उन प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही पर आधारित है जिन्होंने इन सजाओं को अपनी आंखों से देखने का दावा किया है।
‘एंटी-रिएक्शनरी थॉट एंड कल्चर एक्ट’
साल 2020 में उत्तर कोरिया की सरकार ने ‘एंटी-रिएक्शनरी थॉट एंड कल्चर एक्ट’ लागू किया था। इस कानून के तहत दक्षिण कोरियाई फिल्म या ड्रामा देखने पर 5 से 15 साल तक बंधुआ मजदूरी की सज़ा दी जा सकती है, जबकि इसे दूसरों को दिखाने या साझा करने पर सीधे मौत की सज़ा का प्रावधान बताया गया है।
गवाहों के अनुसार, बच्चों और किशोरों को जबरन सार्वजनिक फांसी देखने के लिए मैदानों में लाया जाता है, जिसे सरकार “वैचारिक शिक्षा” बताती है, ताकि लोगों के मन में नियम तोड़ने का डर बैठाया जा सके।
गरीबों के लिए कानून, अमीरों के लिए रिश्वत?
रिपोर्ट में उत्तर कोरिया से भाग चुकीं महिलाओं की आपबीती भी शामिल है। एक महिला किम युन-जू ने बताया कि किशोरावस्था में उन्हें सार्वजनिक फांसी देखने के लिए मजबूर किया गया। वहीं, एक अन्य गवाह चोई सु-बिन ने दावा किया कि जिनके पास 5,000 से 10,000 डॉलर तक की रकम होती है, वे रिश्वत देकर सज़ा से बच सकते हैं, जबकि गरीबों को लेबर कैंप या मौत का सामना करना पड़ता है।
एमनेस्टी का कहना है कि उत्तर कोरिया में कानून सभी के लिए समान होने का दावा करता है, लेकिन उसकी सबसे क्रूर मार समाज के कमजोर वर्गों पर पड़ती है।
अंतरराष्ट्रीय चिंता बढ़ी
मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि उत्तर कोरिया विदेशी संस्कृति को अपने “वैचारिक नियंत्रण” के लिए खतरा मानता है और इसी डर के चलते इतनी कठोर सज़ाएं दी जा रही हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, यह पूरी एक पीढ़ी को भय के माहौल में जीने के लिए मजबूर करने की नीति है।
यह रिपोर्ट एक बार फिर सवाल खड़ा करती है कि क्या किसी देश में मनोरंजन, अभिव्यक्ति और आज़ादी को इस हद तक कुचला जा सकता है कि एक गाना या वेब सीरीज़ भी मौत का कारण बन जाए।

























