प्रशांत भूषण ने हाल ही में (जनवरी 2026 में) मोदी सरकार पर राफेल डील को लेकर फिर से तीखा हमला बोला है। उन्होंने X (पूर्व ट्विटर) पर फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद का एक पुराना इंटरव्यू वीडियो शेयर किया, जिसमें ओलांद कहते हैं कि 2016 की राफेल डील में अनिल अंबानी की कंपनी (रिलायंस डिफेंस) को ऑफसेट पार्टनर बनाने का फैसला भारत सरकार ने किया था, और फ्रांस के पास कोई चॉइस नहीं थी। वीडियो में टेक्स्ट ओवरले के साथ लिखा है: “Anil Ambani was the Modi government’s choice in the Rafale deal; we didn’t have a choice.” भूषण ने इस वीडियो को शेयर करते हुए लिखा कि 2015-16 की 36 राफेल जेट्स वाली डील (करीब 60,000 करोड़ रुपये) में 50% ऑफसेट कॉन्ट्रैक्ट्स दिवालिया हालत में पहुंच चुके अनिल अंबानी की नई कंपनी को दिए गए थे। अब 114 अतिरिक्त राफेल जेट्स की नई डील (करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये) की तैयारी में है, तो क्या इस बार अडानी को बड़ा हिस्सा मिलेगा? उन्होंने इसे “क्रोनी कैपिटलिज्म” और “लूट” का उदाहरण बताया, जहां सरकारी डिफेंस कॉन्ट्रैक्ट्स चुनिंदा उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाने के लिए इस्तेमाल होते हैं।
यह पुराना वीडियो 2018-19 के आसपास का है, जब फ्रेंच मीडिया (मीडियापार्ट) को दिए इंटरव्यू में ओलांद ने यही बात कही थी। उस समय कांग्रेस और विपक्ष ने इसे घोटाले का सबूत बताया था, दावा किया कि HAL (हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड) को बायपास कर रिलायंस को फायदा पहुंचाया गया। दसॉल्ट एविएशन ने इनकार किया कि पार्टनर चुनने की फ्रीडम उनके पास थी। सुप्रीम कोर्ट ने 2019 में डील को क्लीन चिट दी थी, जांच की याचिकाएं (जिनमें भूषण, यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी शामिल थे) खारिज कर दीं।
अब 2026 में नई डील (MRFA प्रोजेक्ट या G2G बेसिस पर) के अंतिम चरण में होने की खबरों के बीच भूषण ने इसे फिर उठाया है। नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने “पहले दिवालिया अंबानी और अब अडानी?” लिखकर सवाल खड़े किए। सरकार का पक्ष है कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा की जरूरत है – IAF की स्क्वाड्रन कमी (29 vs 42) भरने के लिए, Make in India के तहत भारत में असेंबली (नागपुर में FAL), टाटा-दसॉल्ट पार्टनरशिप और 30-60% लोकल प्रोडक्शन होगा। फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों फरवरी 2026 में भारत आने वाले हैं, जहां डील फाइनल हो सकती है।
भूषण के इस हमले से पुराने विवाद फिर गरमा गए हैं। विपक्ष इसे क्रोनीज्म का प्रमाण मानता है, जबकि सरकार इसे आधारहीन बताती है। कुल मिलाकर, यह राजनीतिक बहस का हिस्सा है, जहां 2016 की डील के पुराने आरोप नई डील पर छाया डाल रहे हैं।