पश्चिम बंगाल की राजनीति में ‘दीदी’ के नाम से मशहूर ममता बनर्जी को ‘मास्टर ऑफ टाइमिंग’ क्यों कहा जाता है, इसका प्रमाण उन्होंने एक बार फिर दे दिया है। चुनाव आयोग द्वारा आचार संहिता (Model Code of Conduct) लागू करने के शोर के बीच, ममता ने एक ऐसा ‘साइलेंट धमाका’ किया है जिसने विपक्षी खेमे में हलचल मचा दी है।
राजनीति के गलियारों में अक्सर कयास लगाए जाते हैं, लेकिन ममता बनर्जी ने एक बार फिर साबित कर दिया कि उन्हें पढ़ पाना नामुमकिन है। जब विपक्षी दल अपनी चुनावी रैलियों और उम्मीदवारों की लिस्ट बनाने में व्यस्त थे, तब ममता बनर्जी ने अपनी कलम से एक ऐसा फैसला लिखा जिसने ग्राउंड लेवल पर सीधे लाखों परिवारों को प्रभावित कर दिया।
विशेषज्ञों का मानना था कि सरकार अब केवल रूटीन कार्यों तक सीमित रहेगी, लेकिन चुनाव के औपचारिक ऐलान से महज तीन घंटे पहले ममता ने जो घोषणाएं कीं, उसने अच्छे-अच्छे राजनीतिक पंडितों को हैरान कर दिया।
ममता बनर्जी ने इस घोषणा के जरिए समाज के दो बड़े और प्रभावशाली वर्गों को एक साथ साधा है।
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पुरोहित और मुअज्जिन: इनके मानदेय में 500 की वृद्धि कर इसे 2,000 प्रति माह कर दिया गया है। यह केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि सीधे उन समुदायों के ‘आध्यात्मिक और सामाजिक संरक्षकों’ तक पहुंच बनाने की कोशिश है, जो समाज में गहरा प्रभाव रखते हैं।
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सरकारी कर्मचारी और पेंशनर्स: लंबे समय से लंबित ROPA 2009 DA एरियर के भुगतान का ऐलान करके ममता ने मध्यम वर्ग और सरकारी मशीनरी की नाराजगी को दूर करने की कोशिश की है। मार्च 2026 से मिलने वाला यह पैसा लाखों शिक्षकों, पंचायत कर्मियों और स्थानीय निकायों के कर्मचारियों के लिए किसी ‘बोनस’ से कम नहीं है।
ममता बनर्जी के इस कदम की सबसे बड़ी ताकत इसकी टाइमिंग है। चुनाव आयोग के प्रेस कॉन्फ्रेंस से ठीक पहले यह घोषणा कर उन्होंने विपक्ष को हमले का कोई मौका ही नहीं दिया।
अब अगर विपक्ष इसका विरोध करता है, तो वह जनता की नजर में ‘जन-विरोधी’ दिखेगा। अगर वे चुप रहते हैं, तो ममता इस बढ़त (Lead) को चुनाव प्रचार में भुनाने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं।
ममता बनर्जी का कहना है कि हमने अपनी माँ-माटी-मानुष सरकार के वादे को निभाया है। हमारा प्रयास है कि हमारी समृद्ध आध्यात्मिक विरासत के संरक्षकों और हमारे कर्मचारियों को वह सम्मान मिले जिसके वे हकदार हैं। इस एक फैसले ने ममता बनर्जी को चुनाव से ठीक पहले एक ‘प्रो-एक्टिव’ नेता के रूप में पेश किया है। 2,000 का मानदेय और DA एरियर का भुगतान, ये वो दो चाबियां हैं जिनसे ममता ने ग्रामीण और शहरी दोनों ही वोट बैंक के तालों को खोलने की कोशिश की है।
अब जबकि बंगाल चुनाव के मुहाने पर खड़ा है, ‘दीदी’ का यह आखिरी दांव आने वाले नतीजों में गेम चेंजर साबित हो सकता है।
















