यह कहानी है भारत में संचार क्रांति के उस दौर की, जब बिजली की तरह तार से दौड़ती आवाज किसी जादू से कम नहीं थी। आइए जानते हैं उस भारतीय शख्सियत के बारे में, जिसने अंग्रेजों के दौर में अपनी धाक जमाई और देश का पहला ‘प्राइवेट’ टेलीफोन कनेक्शन हासिल किया।
साल 1876 में अलेक्जेंडर ग्राहम बेल ने दुनिया को टेलीफोन का तोहफा दिया और इसके महज 5 साल बाद ही 1881 में अंग्रेज इस तकनीक को भारत ले आए। इंग्लैंड की ‘ओरिएंटल टेलीफोन कंपनी लिमिटेड’ ने कलकत्ता, बांबे और मद्रास में एक्सचेंज खोलने की तैयारी की।
28 जनवरी 1882 को कलकत्ता मतलब कोलकाता में भारत का पहला टेलीफोन एक्सचेंज शुरू हुआ। इसकी क्षमता महज 93 कनेक्शन की थी। नियम के मुताबिक, ये शुरुआती फोन सिर्फ बड़े अंग्रेज अफसरों और सरकारी दफ्तरों के लिए तय थे। लेकिन, इन 50 खास नंबरों की लिस्ट में एक नाम ऐसा था जिसने सबको चौंका दिया— वह नाम था बाबू सागर दत्त।
बाबू सागर दत्त 19वीं सदी के कोलकाता के एक दिग्गज बंगाली व्यापारी और उद्योगपति थे। एक साधारण परिवार में जन्मे सागर दत्त ने शून्य से अपना सफर शुरू किया और अपनी व्यापारिक सूझबूझ से जूट, नमक, कपड़ा और शिपिंग के क्षेत्र में एक साम्राज्य खड़ा कर दिया।
सागर दत्त केवल एक व्यापारी नहीं थे, बल्कि यूरोपीय कंपनियों के विश्वसनीय बिजनेस पार्टनर भी थे। उनकी आर्थिक शक्ति और सामाजिक प्रतिष्ठा इतनी बड़ी थी कि अंग्रेज भी उन्हें नजरअंदाज नहीं कर सकते थे। यही वजह थी कि जब टेलीफोन जैसा आधुनिक यंत्र भारत आया, तो सागर दत्त उसे हासिल करने वाले पहले भारतीय बने।
आज के दौर में हमारे मोबाइल नंबर 10 अंकों के होते हैं, लेकिन 1882 में सिस्टम बहुत ही सरल और छोटा था। कोलकाता के डलहौजी स्क्वायर के पास बने उस एक्सचेंज में कुल 50 ग्राहकों की सूची थी।
नंबर 1: टेलीफोन एक्सचेंज का खुद का नंबर था।
नंबर 2: सरकारी दफ्तर के लिए सुरक्षित था।
नंबर 50: बाबू सागर दत्त का निजी नंबर था, जो उनके कोलूटोला स्थित आवास पर लगा था।
क्या आप जानते हैं? उस दौर में फोन करने के लिए आप आज की तरह नंबर डायल नहीं कर सकते थे। जैसे ही आप फोन का चोगा उठाते, एक्सचेंज में घंटी बजती थी। वहां बैठा ऑपरेटर आपसे पूछता था कि आप किससे बात करना चाहते हैं। फिर वह मैन्युअल रूप से स्विचबोर्ड पर प्लग लगाकर आपके तार को दूसरे व्यक्ति के तार से जोड़ता था। जब बातचीत खत्म हो जाती थी तो कॉल कटने पर ऑपरेटर को सूचित किया जाता था।
सागर दत्त का नाम आज भी कोलकाता के ‘सागर दत्ता अस्पताल’ के रूप में जीवित है। वे एक बड़े दानवीर थे जिन्होंने अपनी संपत्ति का बड़ा हिस्सा शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए ट्रस्टों को दान कर दिया। उन्होंने साबित किया कि एक भारतीय न केवल तकनीक को सबसे पहले अपना सकता है, बल्कि उसे समाज की भलाई के लिए भी इस्तेमाल कर सकता है।
बाबू सागर दत्त की कहानी हमें याद दिलाती है कि कैसे एक भारतीय व्यापारी ने अपनी मेहनत और रसूख के दम पर ब्रिटिश राज के दौर में भी आधुनिकता के पहले पायदान पर अपना स्थान पक्का किया।

















