पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की तारीखों के करीब आते ही राज्य का सियासी पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया है। चुनाव आयोग द्वारा 23 मार्च की आधी रात को जारी की गई पहली SIR सप्लीमेंट्री वोटर लिस्ट ने राज्य में एक नया राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया है। सूची में कितने नाम जुड़े और कितने हटे, इसकी स्पष्ट जानकारी न होने से ‘अनिश्चितता’ के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है।
बता दें कि 28 फरवरी को जारी अंतिम सूची में करीब 60 लाख नामों को ‘अंडर एडजुडिकेशन’ (विचाराधीन) चिह्नित किया गया था। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद 705 न्यायिक अधिकारियों को इन नामों की स्क्रूटनी में लगाया गया। मुख्य निर्वाचन अधिकारी मनोज कुमार अग्रवाल के अनुसार, अब तक लगभग 29 लाख मामलों पर फैसला लिया जा चुका है, जबकि बाकी पर प्रक्रिया अभी भी जारी है।
तृणमूल कांग्रेस ने इस प्रक्रिया को सीधे तौर पर लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला करार दिया है। कोलकाता के मेयर और मंत्री फिरहाद हकीम ने आरोप लगाया कि भवानीपुर विधानसभा क्षेत्र में करीब 40% नामों के साथ छेड़छाड़ हुई है। अगर चुनाव आयोग नागरिकों को वोट देने से रोकता है, तो वह संविधान और भारत के खिलाफ है। हम इस मामले में हाईकोर्ट का रुख करेंगे।
दूसरी ओर, भाजपा ने इस कदम का स्वागत करते हुए इसे ‘स्वच्छ चुनाव’ की दिशा में बड़ा कदम बताया है।
प्रदेश अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्या ने स्पष्ट किया है कि यह पूरी प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में हो रही है और पार्टी रणनीतिक स्तर पर अपनी सीटों पर फोकस कर रही है। उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि नाम आधी रात को नहीं बदलते, बस फर्जी मतदाताओं की सफाई की गई है। लोकतंत्र में केवल वैध मतदाताओं को ही जगह मिलनी चाहिए।
चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि जिन लोगों के नाम हटाए गए हैं, वे 15 दिनों के भीतर निर्दिष्ट ट्रिब्यूनल में अपनी अपील दर्ज करा सकते हैं। हालांकि, वोटर लिस्ट डाउनलोड करने में आ रही तकनीकी दिक्कतों ने आम जनता की परेशानी बढ़ा दी है।
बंगाल की सत्ता की कुर्सी का रास्ता अब इन ‘सप्लीमेंट्री सूचियों’ के विवाद से होकर गुजर रहा है। जहां एक ओर सुरक्षा कड़ी कर दी गई है, वहीं दूसरी ओर चुनाव आयोग के अगले आधिकारिक आंकड़ों पर सबकी नजरें टिकी हैं।















