बांग्लादेश हाई कमीशन के बाहर हुए एक छोटे प्रदर्शन को लेकर दोनों देशों के विदेश मंत्रालयों के बीच बयानबाजी तेज हो गई है। यह प्रदर्शन बांग्लादेश के मयमनसिंह में हिंदू युवक दीपू चंद्र दास की भीड़ द्वारा लिंचिंग (पीट-पीटकर हत्या) के विरोध में हुआ था।दीपू चंद्र दास (25-27 वर्षीय) एक गारमेंट फैक्ट्री में काम करने वाले युवक थे। 18 दिसंबर को कथित ईश-निंदा के आरोप में एक उग्र भीड़ ने उन्हें पीटा, पेड़ से बांधा और शव को आग लगा दी। इस घटना ने बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अंतरिम सरकार ने इसे निंदनीय बताया और 10 आरोपियों को गिरफ्तार किया, लेकिन भारत ने इसे अल्पसंख्यकों पर हमलों की श्रृंखला का हिस्सा माना। 
भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) ने 21 दिसंबर को बयान जारी कर कहा कि प्रदर्शन शांतिपूर्ण और संक्षिप्त था। लगभग 20-25 युवक हाई कमीशन के बाहर इकट्ठा हुए, दीपू दास की “भयानक हत्या” के विरोध में नारे लगाए और बांग्लादेश में सभी अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की मांग की। MEA ने स्पष्ट किया कि कोई सुरक्षा उल्लंघन नहीं हुआ, बाड़ तोड़ने की कोशिश नहीं की गई और पुलिस ने कुछ मिनटों में भीड़ को तितर-बितर कर दिया। बांग्लादेशी मीडिया की कुछ रिपोर्ट्स को “भ्रामक प्रोपेगैंडा” बताते हुए MEA ने कहा कि भारत विएना कन्वेंशन के तहत सभी विदेशी मिशनों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है। साथ ही, बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हमलों पर गहरी चिंता जताई और दोषियों को सजा देने की मांग की।
बांग्लादेशी न्यूज एजेंसी BSS के अनुसार अंतरिम सरकार के विदेश मामलों के सलाहकार एम तौहीद हुसैन ने कहा कि हम भारतीय प्रेस नोट (भारत के जवाब की विज्ञप्ति) को पूरी तरह से खारिज करते हैं. उन्होंने कहा कि इस मुद्दे को ऐसे पेश किया गया है, जैसे यह बहुत आसान हो, जबकि असल में ऐसा नहीं है. हमारा मिशन डिप्लोमैटिक इलाके के काफी अंदर है, किनारे पर नहीं. उन्होंने कहा, वे (भारत) कहते हैं कि शायद 20-25 लोग थे, लेकिन बात यह नहीं है. सवाल यह है कि एक हिंदू चरमपंथी संगठन के 25 या 30 लोगों का एक समूह एक सुरक्षित इलाके में इतनी दूर तक कैसे आ सकता है. सामान्य परिस्थितियों में, उन्हें वहां बिल्कुल भी नहीं पहुंचना चाहिए था.
यह विवाद बांग्लादेश में हालिया अशांति की पृष्ठभूमि में आया है, जहां छात्र नेता शरीफ उस्मान हादी की मौत के बाद हिंसा भड़की। दोनों देश राजनयिक चैनलों से संपर्क में हैं, लेकिन अल्पसंख्यक सुरक्षा और मिशनों की सुरक्षा जैसे मुद्दे संबंधों में तनाव बढ़ा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला द्विपक्षीय संबंधों को और जटिल बना सकता है, खासकर जब बांग्लादेश में चुनाव की तैयारी चल रही है।








