बिहार की राजनीति इस वक्त एक ऐसे चौराहे पर खड़ी है जहाँ ‘सुशासन बाबू’ की विरासत को संभालने के लिए भाजपा एक नए और सर्वमान्य चेहरे की तलाश में है। सम्राट चौधरी से लेकर नित्यानंद राय तक कई दिग्गज कतार में हैं, लेकिन गलियारों में एक नाम की गूंज सबसे अलग है— सैयद शाहनवाज हुसैन।
यह सिर्फ बिहार का मुख्यमंत्री चुनने की बात नहीं है, बल्कि पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल के चुनाव और राष्ट्रीय स्तर पर ‘सबका साथ, सबका विकास’ के नैरेटिव को स्थापित करने की एक सोची-समझी रणनीति हो सकती है।
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की ताकत का सबसे बड़ा स्तंभ वहां का करीब 30% मुस्लिम वोट बैंक है। यदि भाजपा बिहार जैसे महत्वपूर्ण राज्य में शाहनवाज हुसैन को मुख्यमंत्री की कमान सौंपती है, तो इसका सीधा असर बंगाल की सीमावर्ती सीटों पर पड़ेगा।
विपक्ष के ‘सांप्रदायिक राजनीति’ के आरोपों को यह फैसला जड़ से खत्म कर देगा। शाहनवाज खुद कोसी और सीमांचल से आते हैं, जिसका सीधा सांस्कृतिक और सामाजिक जुड़ाव बंगाल के मालदा, मुर्शिदाबाद और दिनाजपुर जैसे जिलों से है।
नीतीश कुमार की ताकत उनकी सौम्य छवि और विकासवादी सोच रही है। शाहनवाज हुसैन इस खांचे में फिट बैठते हैं। बिहार के उद्योग मंत्री के रूप में उन्होंने ‘एथेनॉल हब’ की जो नींव रखी, उसने बिहार को निवेश के नक्शे पर ला खड़ा किया। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में सबसे युवा कैबिनेट मंत्री रहने का उनका अनुभव उन्हें प्रशासनिक बारीकियों में माहिर बनाता है।
शाहनवाज हुसैन का चेहरा भाजपा के लिए उस ‘साइलेंट वोटर’ को अपनी ओर खींचने का जरिया बन सकता है जो विकास तो चाहता है लेकिन कट्टरता से दूर रहता है। शाहनवाज का चयन केवल एक व्यक्ति का चयन नहीं, बल्कि भाजपा की उस समावेशी सोच का प्रमाण होगा जो परिवारवाद से ऊपर उठकर प्रतिभा और अनुभव को तरजीह देती है।
बेशक, पार्टी के भीतर एक धड़ा हिंदुत्व की लहर को कमजोर होने के डर से आशंकित हो सकता है, लेकिन राजनीति अक्सर ‘रिस्क और रिवॉर्ड’ का खेल होती है। बिहार में 17% मुस्लिम आबादी को नजरअंदाज करना अब संभव नहीं है, और शाहनवाज उस खाई को पाटने वाले सबसे मजबूत पुल हैं।
यदि भाजपा बिहार की कमान शाहनवाज हुसैन को सौंपती है, तो यह न केवल बिहार में ‘जंगलराज’ बनाम ‘सुशासन’ की लड़ाई को नया आयाम देगा, बल्कि बंगाल चुनाव में ‘दीदी’ के अभेद्य किले में सेंध लगाने का सबसे बड़ा हथियार भी बनेगा।
















