बिहार विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद कांग्रेस पार्टी अब डैमेज कंट्रोल और बड़े संगठनात्मक बदलाव के दौर में प्रवेश कर चुकी है। पार्टी के उच्च नेतृत्व ने बिहार में अपनी स्थिति सुधारने के लिए पूर्ण रीसेट की तैयारी शुरू कर दी है। चुनाव में 61 सीटों पर उतरने के बावजूद कांग्रेस केवल 6 सीटों पर सिमट गई, जिसकी जिम्मेदारी मुख्य रूप से बिहार प्रभारी कृष्णा अल्लावरु और प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम पर मानी जा रही है। दोनों को करीब एक साल पहले ही यह जिम्मेदारी सौंपी गई थी, लेकिन संगठन को मजबूत करने और चुनावी रणनीति बनाने में पार्टी पूरी तरह असफल रही।
दिल्ली में 27 नवंबर 2025 और 24 जनवरी 2026 को हुई समीक्षा बैठकों के बाद आलाकमान ने बड़ा फैसला लिया है। पार्टी अब EBC-OBC पर अत्यधिक निर्भरता कम करके अपने पारंपरिक वोट बैंक—भूमिहार, ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम—पर दोबारा फोकस करेगी। जातीय सर्वे के मुताबिक ये समूह बिहार की लगभग 44 प्रतिशत आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं। 1990 से पहले कांग्रेस इन्हीं समीकरणों के दम पर राज्य में मजबूत रही थी, लेकिन बाद में यह आधार कमजोर पड़ गया। नए रोडमैप के तहत संभावना है कि प्रदेश कांग्रेस की कमान किसी प्रभावशाली सवर्ण नेता को सौंपी जाए, जबकि संगठन में दलितों और पिछड़ों को अधिक प्रतिनिधित्व और नई ऊर्जा के साथ शामिल किया जाएगा।
प्रदेश अध्यक्ष चुनने के लिए एक नेशनल सर्च कमेटी गठित की जा रही है, जो 5-6 नामों का पैनल तैयार करेगी, और आलाकमान उनमें से एक को अंतिम रूप से चुन लेगा।यह बदलाव सिर्फ नेतृत्व तक सीमित नहीं रहेगा। संगठन को जमीनी स्तर पर पुनर्जीवित करने के लिए 29 नेशनल ऑब्जर्वर नियुक्त किए गए हैं, जो जिलों में जाकर नए और सक्षम चेहरों की तलाश करेंगे। फरवरी के अंत तक नए जिलाध्यक्षों की नियुक्ति और जून तक नए प्रदेश प्रभारी व प्रदेश अध्यक्ष की प्रक्रिया पूरी होने की उम्मीद है।
कांग्रेस इस पूरे अभ्यास को 2030 के विधानसभा चुनाव से पहले बिहार में अपनी सियासी जमीन दोबारा मजबूत करने की बड़ी रणनीति का हिस्सा मान रही है। यह बदलाव केवल चेहरों का नहीं, बल्कि पार्टी की पूरी सियासी दिशा और सामाजिक आधार को बदलने की कोशिश है, ताकि भविष्य के लोकसभा, विधानसभा और स्थानीय चुनावों में बेहतर प्रदर्शन संभव हो सके।































