पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ी है। तीसरे कार्यकाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी न सिर्फ सत्ता बचाने की लड़ाई लड़ रही हैं, बल्कि इतिहास रचने के बेहद करीब भी हैं। अगर वे अगला चुनाव जीतने में सफल रहती हैं, तो वे दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के 15 वर्ष 25 दिन के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ते हुए देश की सबसे लंबे समय तक शासन करने वाली महिला मुख्यमंत्री बन जाएंगी। लेकिन यह राह पहले से कहीं ज्यादा कठिन, जटिल और जोखिमों से भरी हुई है।
बंगाल के लिए एक मशहूर कहवात है कि बंगाल जो आज सोचता है दुनिया उसे 100 साल बाद सोचती है और अगर आपको पश्चिम बंगाल को समझना है तो आपको वहां के लोगों की भावना, वहां की राजनीति को समझना बेहद जरूरी होगा। ममता बनर्जी की राजनीति संघर्ष, टकराव और भावनात्मक अपील के इर्द गिर्द ही रही है। कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस बनाने के बाद उन्होंने 34 साल तक बंगाल पर राज करने वाले वामपंथी किले को 2011 में ध्वस्त किया। यह सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं था, बल्कि बंगाल की राजनीति की आत्मा में बदलाव था। तब से लेकर अब तक ममता ने खुद को बंगाल की “अस्मिता” के प्रतीक के रूप में स्थापित किया है—दिल्ली के मुकाबले कोलकाता, भाजपा के मुकाबले तृणमूल और मोदी के मुकाबले ममता।
पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने पूरी ताकत झोंक दी थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमित शाह से लेकर पार्टी का पूरा संगठन बंगाल में डेरा डाले था। नतीजा यह हुआ कि भाजपा की सीटें 2 से बढ़कर 77 हो गईं। फिर भी ममता तीसरी बार मुख्यमंत्री बनीं। राजनीतिक पंडितों की राय बंटी हुई रही—कुछ ने इसे ममता का करिश्मा बताया, तो कुछ ने इसे मुस्लिम वोटों के एकतरफा ध्रुवीकरण का परिणाम माना।
तथ्य यह है कि:
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बंगाल में लगभग 30% मुस्लिम आबादी है
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टीएमसी को 49% वोट मिले
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भाजपा लगभग 39% वोटों के साथ दूसरे नंबर पर रही
इसका अर्थ यह निकाला गया कि मुस्लिम वोटों ने कांग्रेस और वाम दलों को छोड़कर सामूहिक रूप से टीएमसी का रुख किया, ताकि भाजपा को सत्ता से रोका जा सके।
ममता बनर्जी की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत रही है—महिलाएं। ‘लक्ष्मी भंडार’ जैसी योजनाओं ने ग्रामीण और शहरी महिलाओं के बीच टीएमसी को अभूतपूर्व समर्थन दिलाया। गर्भावस्था से लेकर वृद्धावस्था तक की योजनाओं ने ममता को “दीदी” से आगे बढ़ाकर “संरक्षक” की छवि दी।
युवाओं के लिए छात्रवृत्ति, स्वास्थ्य बीमा और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं ने भी टीएमसी की जड़ें मजबूत कीं। यही कारण है कि मौजूदा विधानसभा में भाजपा को छोड़कर कांग्रेस और वामपंथी दल शून्य पर सिमट गए।
ममता सिर्फ योजनाओं की नेता नहीं हैं, वे भावनाओं की राजनीति भी बखूबी समझती हैं।
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2011 में वामपंथियों पर हमले का आरोप
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2021 में चुनाव प्रचार के दौरान घायल पैर
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‘बाहरी बनाम बंगाल’ का नैरेटिव
हर बार उन्होंने खुद को पीड़ित और बंगाल की रक्षक के रूप में पेश किया। इस बार उन्होंने SIR को मुद्दा बनाकर चुनाव आयोग और भाजपा को कटघरे में खड़ा किया है। सुप्रीम कोर्ट में खुद बहस कर यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि “दिल्ली, बंगाल के लोकतंत्र से खेल कर रही है।”
हालांकि इस बार हालात बदले हुए हैं। ममता के लिए खतरे तीन दिशाओं से उभर रहे हैं—
1. मुस्लिम वोटों में विभाजन – टीएमसी से निष्कासित नेता हुमायूं कबीर की नई पार्टी, AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी का समर्थन और मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद बनाने की घोषणा—ये सभी संकेत मुस्लिम वोटों के बंटवारे की ओर इशारा कर रहे हैं। अगर मुस्लिम वोट एकमुश्त टीएमसी को नहीं मिले, तो ममता का गणित बिगड़ सकता है।
2. हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण – बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमलों की खबरों से बंगाल का हिंदू समाज असहज है। ममता पर लंबे समय से “मुस्लिम तुष्टिकरण” का आरोप लगता रहा है। भाजपा इसी मुद्दे को धार देकर हिंदू वोटों को POLARIZE करने कोशिश कर रही है।
3. केंद्रीय एजेंसियों का दबाव – ईडी, सीबीआई और आयकर विभाग के साथ ममता का टकराव नया नहीं है। लेकिन आई-पैक रेड जैसे मामलों ने उनके करीबी दायरे को असहज कर दिया है। चुनाव से पहले यह दबाव टीएमसी के लिए बड़ी परेशानी बन सकता है।
ममता बनर्जी के सामने यह चुनाव सिर्फ सत्ता बचाने की लड़ाई नहीं है—यह उनकी राजनीतिक विरासत का फैसला करेगा। अगर वे जीतती हैं, तो वे न सिर्फ शीला दीक्षित का रिकॉर्ड तोड़ेंगी, बल्कि यह साबित करेंगी कि भाजपा के युग में भी एक क्षेत्रीय नेता अपने दम पर राष्ट्रीय पार्टी को रोक सकता है।
लेकिन अगर सामाजिक गणित बिगड़ा, भावनात्मक मुद्दे काम नहीं आए और वोट बैंक बिखरा—तो यह चुनाव ममता के अब तक के सबसे मजबूत किले में सबसे बड़ी दरार भी साबित हो सकता है। बंगाल तैयार है—अब देखना यह है कि “दीदी” इतिहास बनाती हैं या इतिहास उन्हें चुनौती देता है।
































