भोपाल के पॉश इलाके शाहपुरा में लक्ष्मी कैंपस की गलियों में कुछ सालों से पांच बेजुबान दोस्त घूमते थे। एक छोटा-सा पिल्ला सहित ये कुत्ते कॉलोनी के निवासियों के लिए सिर्फ आवारा जानवर नहीं थे—वे परिवार के सदस्य जैसे थे। बच्चे उन्हें देखकर मुस्कुराते, बुजुर्ग उन्हें रोटी के टुकड़े खिलाते, और कई परिवार रोज़ाना उनके लिए पानी और खाना रखते थे। ये कुत्ते कॉलोनी की सुरक्षा में भी मदद करते थे—रात को भौंककर अजनबियों से सावधान करते, और दिन में बच्चों के साथ खेलते।
फिर आया 25 जनवरी का वो दिन, जब अचानक ये सभी कुत्ते गायब हो गए। पहले तो किसी ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया, सोचा शायद कहीं घूमने गए होंगे। लेकिन जब शाम तक भी नहीं लौटे, तो चिंता होने लगी। कुछ संवेदनशील निवासियों ने उन्हें ढूंढना शुरू किया। पास के सुनसान ग्राउंड में झाड़ियों के पीछे दो कुत्ते पड़े मिले—तड़पते हुए, दम तोड़ते हुए। थोड़ी दूर और दो, और उनके साथ वो नन्हा पिल्ला भी, जो अभी-अभी दुनिया देख रहा था। दिल दहल गया।
पशु प्रेमी और स्थानीय एक्टिविस्ट बिंदु रमाकांत पांडे ने बताया कि जैसे ही उन्हें पता चला, सभी ने भागकर कुत्तों को उठाया। बेहोश, कमजोर, लेकिन अभी सांस ले रहे थे। उन्हें तुरंत नजदीकी पशु चिकित्सालय ले जाया गया। डॉक्टरों ने जांच की तो सच्चाई सामने आई—खाने में जहर मिलाया गया था। जहर इतना घातक था कि इलाज के बावजूद एक-एक करके सभी की मौत हो गई। वो छोटा पिल्ला, जो शायद अपनी मां के साथ खेल रहा होगा, वो भी नहीं बच सका।
कल्पना कीजिए उस दर्द को—जिन कुत्तों को लोग प्यार से “भैया”, “छोटू” या “लकी” कहकर बुलाते होंगे, उन्हें किसी ने ठंडे दिमाग से जहर देकर मार डाला। वो भी ऐसे इलाके में जहां लोग खुद को सभ्य और शिक्षित मानते हैं। कॉलोनी के बच्चे आज भी पूछते हैं—”उनकी मम्मी कहां गई? पिल्ला क्यों नहीं खेल रहा?” ये सिर्फ पांच कुत्तों की मौत नहीं है। ये उस संवेदना की मौत है जो इंसान को इंसान बनाती है। ये उस करुणा का अंत है जो बेजुबानों के प्रति हमारी जिम्मेदारी सिखाती है।
स्थानीय निवासियों का गुस्सा जायज है। उन्होंने शाहपुरा थाने में शिकायत दर्ज कराई है। पुलिस ने अज्ञात आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है और सीसीटीवी फुटेज जांच रही है। लेकिन सवाल सिर्फ दोषियों को सजा देने का नहीं है। सवाल है कि क्या हमारी सभ्यता इतनी कमजोर हो गई है कि एक पिल्ले की मासूम आंखों में भी हमारा क्रोध झेल नहीं सकता?
ये घटना हमें याद दिलाती है कि सच्ची मानवता तब दिखती है जब हम उनसे प्यार करते हैं जो कुछ बोल नहीं सकते, बदला नहीं ले सकते। आइए, कम से कम इतना तो करें—अपने आसपास के इन बेजुबान साथियों की रक्षा करें, और ऐसी क्रूरता को कभी बर्दाश्त न करें। क्योंकि अगर हम बेजुबानों की सुन नहीं सकते, तो हम इंसान होने का हक भी खो देते हैं।






























