उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने पुलिस प्रशासन की कार्यशैली और जांच प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिसे पुलिस ने ‘फर्जी आईएएस’ बताकर गाजे-बाजे के साथ गिरफ्तार किया था, अब उसने खुद को ‘असली अधिकारी’ बताते हुए ऐसे दस्तावेज़ पेश किए हैं कि पुलिस विभाग के आला अधिकारियों ने चुप्पी साध ली है।
गिरफ्तार किए गए राहुल कौशिक ने जमानत पर बाहर आने के बाद अपनी चुप्पी तोड़ी है। राहुल ने मीडिया के सामने साल 2008 की सिविल सर्विस परीक्षा का रिजल्ट, यूपीएससी की 728वीं रैंक की अखबार कटिंग और गृह मंत्रालय द्वारा जारी पहचान पत्र पेश किए। राहुल का दावा है कि वह फर्जी नहीं बल्कि विभाग द्वारा प्रताड़ित अधिकारी हैं।
राहुल कौशिक का कहना है कि 12 मार्च की रात 10-12 पुलिसकर्मी मेरे घर में घुसे, मेरे साथ बदसलूकी की और बिना मेरा पक्ष सुने मुझे अपराधी की तरह पेश किया गया।”
जांच में यह बात सामने आई है कि मामला पूरी तरह ‘फर्जीवाड़े’ का नहीं बल्कि ‘विभागीय विवाद’ का है। राहुल पर 2017-18 में धोखाधड़ी के आरोप लगे थे। इन आरोपों के चलते उन्हें 2019 में सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था।
राहुल इस बर्खास्तगी के खिलाफ सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT) में कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। उनका तर्क है कि जब तक मामला विचाराधीन है, उनका पद और पहचान पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।
वहीं, सिविल लाइन के सीओ अभिषेक तिवारी के अनुसार, राहुल कौशिक आईएएस होने का धौंस दिखाकर लोगों को धमकाते थे और 112 नंबर पर फोन कर अधिकारियों को भ्रामक जानकारी देते थे। पुलिस का कहना है कि इसी पुष्टि के बाद उन्हें नौचंदी थाने ले जाकर कार्रवाई की गई थी।
इस मामले ने अब एक कानूनी और प्रशासनिक बहस छेड़ दी है:
-
क्या पुलिस ने गिरफ्तारी से पहले राहुल के सर्विस रिकॉर्ड और कैट (CAT) में चल रहे मामले की पड़ताल की थी?
-
क्या किसी बर्खास्त अधिकारी द्वारा खुद को अधिकारी बताना ‘फर्जीवाड़ा’ की श्रेणी में आता है या यह केवल प्रोटोकॉल का उल्लंघन है?
-
क्या एक फोन कॉल पर हुई कहासुनी के बाद रंजिशन यह कार्रवाई की गई?
राहुल कौशिक फिलहाल मानसिक दबाव में हैं और डॉक्टरों की सलाह पर दवाइयां ले रहे हैं। उन्होंने पुलिस की इस बर्बरता और छवि खराब करने के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी है। अब देखना यह है कि मेरठ पुलिस इन गंभीर आरोपों पर क्या स्पष्टीकरण देती है।















