बिहार की सियासत का वो इलाका, जहाँ टाल की मिट्टी में बारूद और सत्ता की धमक दोनों घुली हुई है। नाम है—मोकामा। वो मोकामा, जिसे पिछले दो दशकों से ‘छोटे सरकार’ यानी अनंत सिंह का अभेद्य किला माना जाता रहा। लेकिन 16 मार्च 2026 की दोपहर, राज्यसभा चुनाव के लिए वोट डालने आए अनंत सिंह ने एक ऐसा बयान दिया, जिसने बिहार के सियासी गलियारों में भूकंप ला दिया है।
जेल की सलाखों के पीछे से जब अनंत सिंह मतदान के लिए बाहर निकले, तो कयास थे कि वो 2030 की तैयारी की घोषणा करेंगे। लेकिन उन्होंने साफ कह दिया—“अब हम चुनाव नहीं लड़ेंगे, अब हमारे बाल-बच्चे विरासत संभालेंगे।” 65 साल की उम्र, दर्जनों मुकदमे और शरीर पर पड़े गोलियों के निशान—क्या अनंत सिंह अब थक चुके हैं? या फिर ये नीतीश कुमार के प्रति उनकी उस वफादारी का हिस्सा है, जिसमें वो खुद को ‘सिपाही’ और नीतीश को ‘मालिक’ बताते हैं?
अनंत सिंह की कहानी किसी बॉलीवुड थ्रिलर से कम नहीं। 9 साल की उम्र में घर छोड़ा संन्यासी बनने के लिए निकले, लेकिन हाथ में माला की जगह ‘मशीनगन’ आ गई। मोकामा की गलियों में वर्चस्व की जंग और फिर भाई दिलीप सिंह की विरासत को संभालना। 2005 से लेकर 2025 तक, चाहे टिकट JDU का हो, RJD का हो या निर्दलीय—जनता ने हर बार उन्हें जेल से ही जिताकर विधानसभा भेजा।
वो दौर भी याद कीजिए जब डॉक्टरों ने जवाब दे दिया था, लेकिन भाई ने डॉक्टर की कनपटी पर बंदूक रखकर अनंत सिंह का ऑपरेशन करवाया और मौत को मात दी। घर में अजगर पालने वाले और बग्घी पर चलने वाले ‘छोटे सरकार’ का रसूख ही ऐसा था कि एके-47 मिलने के बाद भी मोकामा ने उन्हें कभी नहीं नकारा।
अनंत सिंह के पीछे हटते ही सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या मोकामा में सूरजभान सिंह का ‘सिक्का’ फिर से चलेगा? कभी अनंत सिंह और सूरजभान सिंह की अदावत बिहार की सबसे बड़ी सुर्खियों में रहती थी। पिछले चुनाव में अनंत सिंह ने सूरजभान की पत्नी वीणा देवी को धूल चटाई थी। लेकिन अब जब मैदान खाली हो रहा है, तो क्या सूरजभान अपने साम्राज्य को वापस पाने के लिए नई चाल चलेंगे?
अनंत सिंह ने साफ कर दिया है कि उनकी जगह उनके बच्चे चुनाव लड़ेंगे। लेकिन क्या मोकामा की जनता उनके बेटों को वही ‘मसीहा’ वाला दर्जा देगी जो ‘छोटे सरकार’ को हासिल था? एक चर्चा यह भी है कि क्या अनंत सिंह खुद को लोकसभा के लिए तैयार कर रहे हैं?क्या बेऊर जेल में बंद अनंत सिंह ने ये फैसला स्वास्थ्य कारणों से लिया है या यह किसी बड़ी राजनीतिक सौदेबाजी का हिस्सा है?
मोकामा की टाल अब एक नए मोड़ पर खड़ी है। एक तरफ अनंत सिंह की विरासत बचाने की चुनौती है, तो दूसरी तरफ विरोधियों के लिए दशकों बाद खुला मैदान। ‘छोटे सरकार’ का ये सन्यास मोकामा की राजनीति में शांति लाएगा या वर्चस्व की एक नई जंग शुरू करेगा? यह तो वक्त ही बताएगा।
















