बिहार की सियासत में इन दिनों वह खामोशी है, जो किसी बड़े तूफान के आने से पहले महसूस होती है। करीब ढाई दशकों तक बिहार की सत्ता के धुरी बने रहे नीतीश कुमार अब ‘किंग’ की भूमिका छोड़कर ‘किंगमेकर’ या मार्गदर्शक की भूमिका में नजर आ सकते हैं।पटना के गलियारों से छनकर आ रही खबरों ने राजनीतिक पारे को बढ़ा दिया है। पेश है इस सियासी उलटफेर की एक विस्तृत इनसाइड स्टोरी।
बिहार की राजनीति में ‘चाणक्य’ कहे जाने वाले नीतीश कुमार को लेकर चर्चा गर्म है कि वे अब अपनी पारी का अंत मुख्यमंत्री के तौर पर नहीं, बल्कि देश के उच्च सदन यानी राज्यसभा में जाकर करेंगे। लेकिन असली ट्विस्ट उनके उत्तराधिकारी को लेकर है।
चर्चा है कि नीतीश कुमार अपने बेटे निशांत कुमार को राजनीति की मुख्यधारा में ला सकते हैं। सूत्रों की मानें तो उन्हें उपमुख्यमंत्री बनाकर JDU के भविष्य की कमान सौंपी जा सकती है। वहीं 89 सीटों के साथ राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बनी बीजेपी अब “बड़े भाई” की भूमिका को पूरी तरह भुनाने के मूड में है।
नवंबर 2025 के नतीजों ने बिहार की राजनीतिक तस्वीर साफ कर दी थी। 243 सदस्यों वाली विधानसभा में विपक्ष के पास खोने को बहुत कुछ था, जबकि NDA ने एकतरफा बढ़त बनाई। सत्ता के गलियारों में जिस नए फॉर्मूले की चर्चा है, वह बीजेपी और जेडीयू के बीच एक नए संतुलन की ओर इशारा करता है।
सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते इस बार मुख्यमंत्री भारतीय जनता पार्टी का होगा। यह बिहार बीजेपी के इतिहास में एक युगान्तकारी बदलाव होगा, क्योंकि पिछले 25 साल से पार्टी नीतीश कुमार के पीछे ही खड़ी रही है।
नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने की स्थिति में JDU को संतुष्ट रखने के लिए दो उपमुख्यमंत्री का पद दिया जा सकता है। इसमें एक चेहरा निशांत कुमार का हो सकता है, जिससे पार्टी में ‘विरासत’ और ‘युवा जोश’ दोनों का संदेश जाए।
बिहार में असली ताकत ‘गृह विभाग’ मानी जाती है, जो हमेशा नीतीश कुमार के पास रही है। बीजेपी की मांग है कि अगर मुख्यमंत्री बीजेपी का होगा तो गृह विभाग भी उन्हीं के पास होना चाहिए। लेकिन प्रशासन पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए जेडीयू इस विभाग को छोड़ने में हिचकिचा सकती है।
जहां एक ओर NDA सरकार बनाने के नए फॉर्मूले पर काम कर रहा है, वहीं तेजस्वी यादव की अगुवाई वाला महागठबंधन महज 35 सीटों पर सिमट कर अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। 11% मल्लाह वोटों का दावा करने वाले मुकेश सहनी का खाता न खुलना और ओवैसी की पार्टी (5 सीटें) का सीमांचल में टिके रहना यह बताता है कि बिहार की जनता ने ‘चेहरे’ से ज्यादा ‘गठबंधन के स्थायित्व’ को चुना है।
अगर यह फॉर्मूला हकीकत बनता है, तो बिहार की राजनीति में ‘नीतीश युग’ का एक अध्याय समाप्त होगा और एक नए युग की शुरुआत होगी। क्या बीजेपी का मुख्यमंत्री बिहार की कानून-व्यवस्था और विकास को नई गति दे पाएगा? और क्या जेडीयू, नीतीश के बिना अपने वजूद को बचा पाएगी? ये सवाल अब पटना की हवाओं में बड़ी तेजी से बह रहे हैं।

















