इस योजना के तहत 10,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जो अगले 5 वर्षों में खर्च किया जाएगा। इसका मुख्य लक्ष्य भारत को ग्लोबल बायोफार्मा मैन्युफैक्चरिंग हब बनाना है, जहां बायोलॉजिक्स और बायोसिमिलर्स जैसी एडवांस्ड दवाओं का घरेलू उत्पादन बढ़ेगा। इन दवाओं से डायबिटीज, कैंसर और ऑटोइम्यून डिसऑर्डर्स जैसी बीमारियों का बेहतर और सस्ता इलाज संभव होगा, जिससे मरीजों की जीवन अवधि और जीवन गुणवत्ता में सुधार आएगा।
योजना में बायोफार्मा-फोकस्ड नेटवर्क बनाया जाएगा, जिसमें शामिल है तीन नए नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ फार्मास्यूटिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (NIPERs) की स्थापना। मौजूदा सात NIPERs को अपग्रेड करना। ये संस्थान रिसर्च, नई दवाओं का विकास, क्लिनिकल ट्रायल्स, स्किल डेवलपमेंट और इंडस्ट्री सहयोग पर फोकस करेंगे। इससे आयात पर निर्भरता कम होगी, स्वदेशी इनोवेशन बढ़ेगा और लाखों रोजगार के अवसर पैदा होंगे।
बदलती बीमारी की स्थिति पर फोकसवित्त मंत्री ने कहा कि भारत में अब जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। देश को “डायबिटीज की राजधानी” कहा जाने लगा है, जबकि कैंसर और ऑटोइम्यून बीमारियां भी आम लोगों के लिए चुनौती बनी हुई हैं। इनका इलाज महंगा होने से कई परिवार प्रभावित होते हैं। बायोलॉजिक मेडिसिन्स इन बीमारियों के प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं, लेकिन इन्हें सस्ता और उपलब्ध बनाना जरूरी है।यह योजना आत्मनिर्भर भारत और विकसित भारत @2047 के विजन का हिस्सा है, जो स्वास्थ्य क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव लाएगी। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे न केवल मरीजों को किफायती इलाज मिलेगा, बल्कि भारत वैश्विक स्तर पर बायोटेक और फार्मा में अग्रणी बनेगा।




































