बिहार की राजनीति के क्षितिज पर पिछले दो दशकों से एक ही नाम छाया रहा— नीतीश कुमार। साल 2005 के 24 नवंबर को जब उन्होंने पहली बार पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता संभाली थी, तब किसी ने नहीं सोचा था कि यह ‘इंजीनियर’ बिहार के इतिहास की सबसे लंबी राजनीतिक पारी खेलने जा रहा है। यह नीतीश कुमार के 2005 से 2026 तक के उस सफर की कहानी है, जिसने बिहार को ‘जंगलराज’ के साये से निकालकर ‘विकास’ की दहलीज पर खड़ा किया।
2005 में जब नीतीश कुमार ने सत्ता संभाली, तो उनके सामने चुनौतियों का पहाड़ था। सड़कें गायब थीं और अपराध चरम पर था। उन्होंने सबसे पहले प्रशासनिक ढांचे को मजबूत किया। स्पीडी ट्रायल के जरिए अपराधियों को सजा दिलवाई और ‘जंगलराज’ का अंत किया। गांव-गांव तक पक्की सड़कें और बिजली पहुँचाने का काम युद्ध स्तर पर शुरू हुआ। उन्होंने बेटियों को स्कूल भेजने के लिए ‘साइकिल योजना’ शुरू की, जिसने बिहार के सामाजिक ढांचे को बदल कर रख दिया।
नीतीश कुमार की राजनीति का सबसे चर्चित हिस्सा रहा उनका पाला बदलना। 2013 में नरेंद्र मोदी को पीएम उम्मीदवार बनाए जाने के विरोध में एनडीए छोड़ना हो, या फिर 2015 में धुर विरोधी लालू यादव के साथ ‘महागठबंधन’ बनाना—नीतीश ने हर बार साबित किया कि बिहार की सत्ता की चाबी उन्हीं के पास रहेगी।
नीतीश कुमार ने 2016 में महिलाओं की मांग पर बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू की। यह एक ऐसा फैसला था जिसने उनके ‘महिला वोट बैंक’ को और मजबूत किया।
बीजेपी से आरजेडी और फिर आरजेडी से वापस बीजेपी। इस उठापटक ने उन्हें ‘पलटू बाबू‘ जैसा मजाकिया और तीखा नाम भी दिया, लेकिन उनकी मुख्यमंत्री की कुर्सी कभी नहीं हिली।
2025 के बिहार विधानसभा चुनाव नीतीश के लिए एक बड़ी परीक्षा थी। उन्होंने ‘मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना’ के तहत हर परिवार की एक महिला को 10,000 रुपये की आर्थिक सहायता देने का बड़ा दांव खेला। नतीजा यह हुआ कि महिलाओं के जबरदस्त समर्थन ने एनडीए को 200 से अधिक सीटें दिलाईं और नीतीश ने रिकॉर्ड 10वीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।
जब सब कुछ सुचारू चल रहा था, तभी 4 मार्च 2026 को नीतीश कुमार ने अचानक मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर सबको चौंका दिया। यह इस्तीफा किसी राजनीतिक दबाव में नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा था। नीतीश कुमार ने खुद सोशल मीडिया पर साझा किया कि उनकी दिली इच्छा देश के चारों सदनों (विधानसभा, विधान परिषद, लोकसभा और राज्यसभा) का सदस्य बनने की थी।
लेकिन राजनीति से संन्यास की खबरों के बीच उनके बेटे निशांत कुमार के राजनीति में प्रवेश की चर्चाएं तेज हो गईं, जिससे बिहार की राजनीति में एक नए उत्तराधिकारी की आहट सुनाई देने लगी।
नीतीश कुमार महज एक नेता नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति का वह ध्रुव रहे जिसके इर्द-गिर्द सत्ता घूमती रही। उन्होंने “सड़क, बिजली और पानी” की राजनीति को धरातल पर उतारा। अब 2026 में, जब वह पटना की गलियों से निकलकर दिल्ली के लुटियंस की ओर बढ़ रहे हैं, तो बिहार एक नए नेतृत्व की तलाश में है।
तो ये था बिहार की राजनीति के उस ‘चाणक्य’ का सफर, जिसने सत्ता के गलियारों में न सिर्फ कदम रखे, बल्कि दो दशकों तक उन गलियारों की दिशा तय की।
24 नवंबर 2005 को एक संकल्प के साथ शुरू हुआ यह सफर, 4 मार्च 2026 को एक भावुक विदाई पर आकर ठहरा है। नीतीश कुमार—एक ऐसा नाम जिसे बिहार कभी ‘सुशासन बाबू’ के विकास कार्यों के लिए याद रखेगा, तो कभी ‘पलटू बाबू’ के सियासी दांव-पेंचों के लिए।
उन्होंने सड़क दी, बिजली दी और महिलाओं के हाथों में साइकिल और स्वाभिमान थमाया। लेकिन आज, जब नीतीश कुमार मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़कर दिल्ली की ओर रुख कर रहे हैं, तो बिहार के हर चौराहे पर एक ही सवाल है— क्या बिहार में ‘नीतीश युग’ वाकई समाप्त हो गया है, या फिर यह उनकी किसी नई और बड़ी राजनीतिक बिसात की शुरुआत है?
फिलहाल, बिहार की सत्ता के इस अध्याय पर विराम लग चुका है, लेकिन नीतीश कुमार का व्यक्तित्व और उनका राजनीतिक कौशल भारतीय राजनीति के इतिहास में हमेशा एक पहेली बना रहेगा।

















