12 फरवरी को बांग्लादेश में होने जा रहे आम चुनाव पर सिर्फ ढाका ही नहीं, बल्कि कोलकाता की भी नजर टिकी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस चुनाव के नतीजे का असर पश्चिम बंगाल की राजनीति, खासकर मार्च-अप्रैल में संभावित विधानसभा चुनावों के माहौल पर भी पड़ सकता है।
भारत और बांग्लादेश के रिश्ते ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से जुड़े रहे हैं। सीमावर्ती जिलों में दोनों देशों की घटनाओं का असर अक्सर स्थानीय राजनीति पर दिखाई देता है। हाल के वर्षों में बांग्लादेश में राजनीतिक अस्थिरता, तख्ता पलट की चर्चाएं और अल्पसंख्यक समुदायों पर हमलों की खबरें सामने आई थीं। इन घटनाओं को लेकर भारत के कई हिस्सों, खासकर पश्चिम बंगाल में भी राजनीतिक बहस तेज हुई थी।
जानकार बताते हैं कि बांग्लादेश में बड़ी संख्या में हिंदू वैष्णव परंपरा को मानते हैं। कुछ रिपोर्टों में वहां मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर हमलों की खबरें भी आई थीं, जिनमें इस्कॉन मंदिर से जुड़ी घटनाएं चर्चा में रहीं। इन घटनाओं को लेकर भारत में, विशेषकर बंगाल में, राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर चला। विपक्षी दलों ने राज्य सरकार पर “पर्याप्त प्रतिक्रिया नहीं देने” का आरोप लगाया, जबकि तृणमूल कांग्रेस ने इसे संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय मामला बताते हुए संयम बरतने की बात कही।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की ओर से बांग्लादेश की घटनाओं पर सीमित या संतुलित बयान को लेकर विपक्ष ने सवाल उठाए। भाजपा और अन्य विपक्षी दलों ने इसे हिंदू भावनाओं से जोड़कर मुद्दा बनाया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सीमावर्ती राज्यों में पड़ोसी देश की घटनाएं अक्सर चुनावी विमर्श का हिस्सा बन जाती हैं, और पश्चिम बंगाल भी इससे अछूता नहीं है।
यदि बांग्लादेश में स्थिर और समावेशी सरकार बनती है, तो सीमा पार तनाव और अल्पसंख्यक सुरक्षा का मुद्दा शांत हो सकता है। लेकिन अगर वहां राजनीतिक अस्थिरता जारी रहती है, तो इसका असर पश्चिम बंगाल की चुनावी बहस में दिखाई दे सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि बंगाल की राजनीति में पहचान, सुरक्षा और सीमा से जुड़े मुद्दे पहले भी प्रभाव डाल चुके हैं। ऐसे में ढाका के चुनाव परिणाम कोलकाता की राजनीतिक रणनीति को प्रभावित कर सकते हैं।
12 फरवरी का चुनाव बांग्लादेश के लिए सत्ता का फैसला होगा, लेकिन इसके राजनीतिक और भावनात्मक असर की गूंज पश्चिम बंगाल तक पहुंच सकती है। अब देखना यह है कि बांग्लादेश में बनने वाली नई सरकार क्षेत्रीय स्थिरता और सामाजिक संतुलन को किस दिशा में ले जाती है — और क्या इसका प्रभाव बंगाल की चुनावी राजनीति में भी दिखाई देता है।

































