पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर छिड़ा आंतरिक घमासान अब महज एक राजनीतिक बगावत नहीं रह गया है, बल्कि इसने एक बेहद गंभीर और कानूनी मोड़ ले लिया है। रविवार को टीएमसी के वरिष्ठ नेता और प्रवक्ता कुणाल घोष ने एक ऐसा सनसनीखेज सबूत पेश किया, जिसने बागी खेमे की नींद उड़ा दी है। घोष ने बागी विधायक संदीपान साहा पर सीधे तौर पर पार्टी फंड से ₹25 लाख रुपये निकालने और फिर उसी अकाउंट की जांच कराने की साजिश रचने का संगीन आरोप लगाया है।
इस बड़े वित्तीय खुलासे के बाद अब कोलकाता से लेकर दिल्ली तक के राजनीतिक हलकों में हड़कंप मच गया है और यह सवाल बड़ा हो गया है कि क्या ममता बनर्जी की पार्टी छोड़कर गए बागी विधायकों की सदस्यता अब खतरे में है?
उसी थाली में छेद: ₹440 करोड़ के फ्रीज अकाउंट से जुड़ा है कनेक्शन
दरअसल, बागी विधायकों की शिकायत के बाद टीएमसी का मुख्य बैंक अकाउंट फ्रीज कर दिया गया है, जिसमें पार्टी के तकरीबन ₹440 करोड़ जमा हैं। अब इसी को हथियार बनाकर टीएमसी नेतृत्व ने बागियों को चौतरफा घेरना शुरू कर दिया है।
मीडिया से बात करते हुए कुणाल घोष ने बागी विधायक संदीपान साहा के चुनावी खर्च का पूरा कच्चा चिट्ठा खोलकर रख दिया। घोष ने तंज कसते हुए कहा:
“जो बागी नेता आज खुद को पाक-साफ बताकर पार्टी के अकाउंट्स की जांच की मांग कर रहे हैं, वे खुद उसी पैसे के दम पर विधायक की कुर्सी तक पहुंचे हैं। साहा ने चुनाव के दौरान कुल ₹27 लाख से अधिक का खर्च किया था, जिसमें से पूरे ₹25 लाख उसी टीएमसी बैंक अकाउंट से निकाले गए थे, जिसे आज इन बागियों ने फ्रीज करवाया है।”
“अवैध था पैसा तो चुनाव रद्द हो…” कुणाल घोष का कानूनी दांव
कुणाल घोष ने इसे सिर्फ राजनीतिक दगाबाजी न बताते हुए एक बड़ा चुनावी और कानूनी अपराध करार दिया है। उन्होंने सीधे चुनाव आयोग (Election Commission) का दरवाजा खटखटाने का संकेत देते हुए कहा कि अगर इन बागी नेताओं में जरा भी नैतिकता बची है, तो उन्हें तुरंत वह पूरा पैसा चुनाव आयोग को लौटा देना चाहिए।
घोष ने कानूनी दलील देते हुए कहा:
“कानून के मुताबिक, अगर किसी भी चुनाव में अवैध धन या संदिग्ध स्रोतों से आए पैसे का इस्तेमाल किया जाता है, तो वह पूरा चुनाव ही नाजायज माना जाता है। अगर बागी विधायक दावा कर रहे हैं कि उस खाते में कुछ गड़बड़ थी, तो उन्होंने उसी पैसे से चुनाव क्यों लड़ा? उनका पूरा चुनाव ही रद्द कर दिया जाना चाहिए।”
विपक्ष के इशारे पर ‘पीठ में छुरा’ घोंप रहे हैं गद्दार
टीएमसी नेतृत्व का साफ मानना है कि इस पूरी बगावत की स्क्रिप्ट भारतीय जनता पार्टी (BJP) और अन्य विरोधी दलों के दफ्तरों में लिखी जा रही है। कुणाल घोष ने बागियों को ‘आस्तीन का सांप’ और ‘गद्दार’ बताते हुए आरोप लगाया कि ये विधायक स्वतंत्र रूप से काम नहीं कर रहे हैं, बल्कि विपक्ष के इशारे पर ममता बनर्जी और टीएमसी को बदनाम करने की सोची-समझी साजिश का हिस्सा हैं।
आगे क्या? घोष ने साफ कर दिया है कि ममता बनर्जी इस राजनीतिक ब्लैकमेलिंग के आगे घुटने नहीं टेकेंगी। इस बड़े वित्तीय और कानूनी खुलासे के बाद अब गेंद चुनाव आयोग और कानूनी विशेषज्ञों के पाले में है। अब देखना यह होगा कि बागी विधायक संदीपान साहा और उनका गुट इन तीखे आरोपों पर क्या सफाई पेश करता है।
