पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस बार हवा साधारण नहीं है। यह चुनाव सिर्फ ममता बनर्जी बनाम बीजेपी नहीं, बल्कि पहचान, ध्रुवीकरण और वोटों के केमिस्ट्री की जंग है। 294 सीटों वाले इस राज्य में करीब 120 सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम वोटर चुनाव का रुख तय करते हैं। यही वह इलाका है जहां बीजेपी का रथ बार-बार रुकता दिखता है।
मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर और दक्षिण 24 परगना, नदिया —इन जिलों के कई हिस्से बॉर्डर से सटे इलाके हैं। यहां मुस्लिम आबादी 35-40% से लेकर कई जगहों पर 50% तक है। साल 2011 से लेकर 2021 तक का ट्रेंड साफ है— जैसे-जैसे इन इलाकों में मुस्लिम वोट प्रतिशत बढ़ा, बीजेपी की जीत का ग्राफ घटता गया। तृणमूल कांग्रेस ने यहां मजबूत पकड़ बनाए रखी। बीजेपी का उभार हुआ, लेकिन इन सीटों पर सेंध सीमित रही।
ममता बनर्जी ने अल्पसंख्यक वोटरों के बीच खुद को एक भरोसेमंद चेहरा बनाया। छात्रवृत्ति, मदरसा आधुनिकीकरण, अल्पसंख्यक कल्याण योजनाएं—इन सबने एक सियासी संदेश दिया। उनकी रैलियों में अक्सर सुनाई देता है— “आमी बांग्लार मेये, आमी तोमादेर पासे आछी।” (मैं बंगाल की बेटी हूं, मैं आपके साथ हूं।) यह भावनात्मक अपील बॉर्डर से सटे इलाकों में असरदार रही है।
बीजेपी ने दूसरी तरफ एक अलग चुनावी भाषा गढ़ी—
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घुसपैठ
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NRC
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नागरिकता संशोधन कानून
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हिंदू अस्मिता
पार्टी का फोकस साफ है—जहां मुस्लिम वोटों का मजबूत ध्रुवीकरण है, वहां काउंटर कंसोलिडेशन यानी हिंदू वोटों का एकीकरण। बॉर्डर से सटे इलाकों में यह मुद्दा ज्यादा उछाला जाता है। बीजेपी का दावा है—“बांग्लादेश से लगातार घुसपैठ की वजह से बंगाल की पहचान बदल रही है।” वहीं TMC इसे डर की राजनीति कहती है।
राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं। कांग्रेस-वाम गठबंधन और ISF ने कुछ इलाकों में सेंध लगाने की कोशिश की है। लेकिन अब तक यह सेंध इतनी बड़ी नहीं रही कि TMC की पकड़ कमजोर पड़े।
बीजेपी के लिए असली चुनौती यही है— 120 सीटों में 8-10% का स्विंग भी पूरा गणित बदल सकता है। लेकिन फिलहाल आंकड़े बताते हैं कि मुस्लिम बहुल सीटों में पार्टी की राह आसान नहीं।
बंगाल की राजनीति में अक्सर एक सवाल गूंजता है— “के जीतबे? के हारबे?”
2026 का चुनाव तय करेगा:
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क्या ममता का सामाजिक गठजोड़ चौथी बार सत्ता दिलाएगा?
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या बीजेपी बॉर्डर से सटे इलाकों के समीकरण को बदल देगी?
फिलहाल तस्वीर यही कहती है— जब तक 120 सीटों का यह निर्णायक घेरा जस का तस है, बीजेपी के लिए नवान्नो का रास्ता सीधा नहीं है। बंगाल में रथ भी दौड़ रहा है, और सियासी दीवार भी खड़ी है।
अब देखना है— “बांग्ला कार दोखोले जाबे?” यानी (बंगाल किसके कब्जे में जाएगा?)
























