शिवराज सिंह चौहान ने विधेयक पेश करते हुए कहा कि सरकार महात्मा गांधी के सिद्धांतों पर चलती है और उनके दिल में बसते हैं। उन्होंने जोर दिया कि मोदी सरकार ने मनरेगा पर यूपीए से चार गुना ज्यादा खर्च किया और योजना को मजबूत बनाया। मंत्री ने गांधीजी के अंतिम शब्दों ‘हे राम’ का जिक्र कर राम राज्य की स्थापना से जोड़ा। सरकार का दावा है कि नया विधेयक विकसित भारत 2047 के विजन से जुड़ा है, पारदर्शिता बढ़ाएगा और ग्रामीण विकास को नई दिशा देगा।
विपक्ष की ओर से कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने सबसे तीखा विरोध किया। उन्होंने कहा कि नाम बदलने की यह सनक समझ से परे है, इससे सरकारी खर्च बढ़ता है और गरीबों के अधिकार कमजोर होते हैं। प्रियंका ने विधेयक को वापस लेने और स्थायी समिति को भेजने की मांग की, साथ ही आरोप लगाया कि यह गांधीजी के ग्राम स्वराज के सपने पर हमला है। शशि थरूर ने तंज कसते हुए कहा, “ओ दीवानो, राम का नाम बदनाम न करो।” कांग्रेस, टीएमसी, एनसीपी (एसपी) और अन्य दलों के सांसदों ने विधेयक को समिति में भेजने की मांग की।
समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने भी नाम बदलने को भाजपा की पुरानी आदत बताया और कहा कि इससे कोई बड़ा बदलाव नहीं आएगा। उन्होंने फंडिंग में केंद्र-राज्य अनुपात 60:40 होने से राज्यों पर बोझ बढ़ने का मुद्दा उठाया, साथ ही आरोप लगाया कि केंद्र दूसरों की योजनाओं को अपना नाम देकर क्रेडिट ले रहा है। विपक्ष का कहना है कि मनरेगा अधिकार-आधारित योजना है, जबकि नया विधेयक इसे बजट-निर्भर बनाकर कमजोर करेगा।
राज्यसभा में भी हंगामा हुआ, जहां जेपी नड्डा ने अलग मुद्दे पर विपक्ष को घेरा, लेकिन जी राम जी विधेयक का विरोध दोनों सदनों में जारी रहा। विपक्षी सांसदों ने संसद परिसर में गांधीजी की प्रतिमा के सामने प्रदर्शन किया।यह विधेयक नाम बदलने से आगे बढ़कर फंडिंग, नियंत्रण और रोजगार दिनों में बदलाव लाता है, लेकिन विपक्ष इसे राजनीतिक संदेश और गांधीजी की विरासत पर हमला मानता है। सरकार जहां इसे सुधार बता रही है, वहीं विपक्ष इसे गरीब-विरोधी कदम। संसद में यह बहस आगे भी गर्माए रखेगी। क्या नाम बदलना जरूरी है या योजना को मजबूत करने पर फोकस होना चाहिए? यह सवाल जनता के बीच भी गूंज रहा है।




































