बिहार की सियासी फिजाओं में इन दिनों एक ही सवाल तैर रहा है— ‘नीतीश कुमार के बाद कौन?’ मुख्यमंत्री आवास की कुर्सी को लेकर चर्चाएं अब केवल राजनीतिक गलियारों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि गांव की चौपालों से लेकर शहर की चाय की दुकानों तक, जनता अपने-अपने मुख्यमंत्री चुन रही है। बिहार की राजनीति जिस मुकाम पर खड़ी है, वहां एक बात स्पष्ट मानी जा रही है कि अगला नेतृत्व भाजपा (BJP) के पाले से हो सकता है, लेकिन असली पेंच ‘चेहरे’ की जाति को लेकर फंसा है।
बिहार में मुख्यमंत्री का चुनाव सिर्फ योग्यता या पार्टी लाइन पर नहीं, बल्कि सोशल इंजीनियरिंग के तराजू पर होता है। वर्तमान आंकड़ों के अनुसार, बिहार में अति पिछड़ा वर्ग (EBC) की आबादी लगभग 36 प्रतिशत है। यह वह विशाल वोट बैंक है जिसने नीतीश कुमार को सालों तक सत्ता के शिखर पर बनाए रखा।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि भाजपा इस बार किसी EBC चेहरे पर दांव लगाकर एक बड़ा दांव खेल सकती है। सवाल यह है कि क्या अगला सीएम सवर्ण समाज से होगा या फिर पिछड़ी/अति-पिछड़ी जाति से? यह चुनाव 2025-26 की चुनावी बिसात का सबसे निर्णायक मोड़ साबित होगा। बिहार की राजनीति ने आजादी से अब तक सत्ता का एक लंबा सफर तय किया है, जिसमें वर्चस्व के केंद्र बदलते रहे हैं:
| दौर | प्रमुख समुदाय | मुख्यमंत्रियों की संख्या | प्रमुख नाम |
| कांग्रेस युग (शुरुआती दौर) | ब्राह्मण | 06 | बिनोदानंद झा, जगन्नाथ मिश्रा |
| वर्चस्व का काल | भूमिहार | 05 | डॉ. श्रीकृष्ण सिंह, भगवत झा आजाद |
| क्षत्रिय नेतृत्व | राजपूत | 03 | चंद्रशेखर सिंह |
| मंडल राजनीति (1990 के बाद) | यादव | 04 कार्यकाल | लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी |
| सुशासन का दौर | कुर्मी | 04 कार्यकाल | नीतीश कुमार |
1946 में श्रीकृष्ण सिन्हा से शुरू हुआ सफर 1961 तक सवर्ण राजनीति के स्वर्ण काल के रूप में रहा। उस दौर में कायस्थ, ब्राह्मण, भूमिहार और राजपूत नेताओं का प्रभाव था। लेकिन 1960 के दशक के मध्य में आए सूखे और कांग्रेस की अंदरूनी कलह ने बदलाव के बीज बोए। राम मनोहर लोहिया और कर्पूरी ठाकुर जैसे दिग्गजों ने पिछड़ों को आवाज दी। सामाजिक न्याय की इस लहर ने पहली बार 1967 में कांग्रेस के किले को ढहाया और बिहार में गठबंधन राजनीति की नींव पड़ी।
1990 के दशक में लालू प्रसाद यादव ने ‘MY’ (मुस्लिम-यादव) समीकरण के जरिए सवर्ण वर्चस्व को पूरी तरह चुनौती दी। इसके बाद 2005 में नीतीश कुमार ने भाजपा के साथ मिलकर पिछड़ों के भीतर भी एक नया वर्ग तैयार किया— अति पिछड़ा (EBC) और महादलित।
नीतीश ने पंचायतों में आरक्षण और विकास योजनाओं के जरिए इस वर्ग को अपनी रीढ़ बनाया। आज यही 36% आबादी भाजपा और विपक्षी गठबंधन दोनों की नजर में है। भाजपा के लिए चुनौती सिर्फ मुख्यमंत्री बनाना नहीं, बल्कि एक ऐसा चेहरा ढूंढना है जो सवर्णों को साथ रखते हुए EBC और OBC वोट बैंक में सेंध लगा सके।”
नीतीश कुमार के उत्तराधिकारी का चयन केवल एक व्यक्ति का चयन नहीं होगा, बल्कि यह बिहार की आने वाली 25 साल की राजनीति की दिशा तय करेगा। क्या भाजपा किसी सवर्ण चेहरे को वापस लाएगी या फिर अति-पिछड़ा कार्ड खेलकर विपक्ष के ‘जातीय जनगणना’ वाले नैरेटिव को फेल करेगी? फिलहाल, सस्पेंस बरकरार है।
















