भारतीय राजनीति में यह एक स्थापित सत्य है कि किसी भी क्षेत्रीय दल की सबसे बड़ी ताकत उसका सिर्फ जनाधार नहीं, बल्कि उसका सामाजिक समीकरण और केंद्रीय नेतृत्व के इर्द-गिर्द आंतरिक एकजुटता होती है। लेकिन जब संगठन के भीतर संवाद कमजोर पड़ता है, वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी बढ़ती है और सत्ता से दूरी लंबी हो जाती है, तब सबसे मजबूत दिखने वाला किला भी ढहने लगता है।
हाल ही में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) अपने इतिहास के सबसे बड़े संकट से जूझ रही है। दिल्ली से लेकर कोलकाता तक मचे इस घमासान में टीएमसी के लगभग तीन-चौथाई (80 में से 58 से अधिक) विधायक बागी हो चुके हैं। लोकसभा में भी 28 में से 20 सांसदों ने बागी रुख अपनाते हुए खुद को ‘असली टीएमसी’ बताया है।
बंगाल का यह सियासी भूचाल केवल ममता बनर्जी के लिए ही नहीं, बल्कि बिहार के मुख्य विपक्षी दल राष्ट्रीय जनता दल (RJD) और तेजस्वी यादव के लिए भी एक बहुत गंभीर खतरे की घंटी है।
RJD को तुरंत ‘अलर्ट मोड’ पर क्यों आ जाना चाहिए?
क्षेत्रीय राजनीति का इतिहास गवाह है कि चुनावी हार से ज्यादा खतरनाक वह दौर होता है, जब पार्टी के भीतर का भरोसा कमजोर पड़ने लगता है। नेतृत्व की शैली, टिकट वितरण, वरिष्ठ नेताओं की उपेक्षा और नए सामाजिक समीकरणों को लेकर उठने वाले सवाल धीरे-धीरे बड़े विद्रोह का रूप ले लेते हैं।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि आरजेडी ने बंगाल के इस घटनाक्रम से समय रहते सबक नहीं लिया, तो आने वाले समय में बिहार की राजनीति में भी ऐसे ही समीकरण देखने को मिल सकते हैं। आइए समझते हैं वह सबसे प्रमुख कारण, जिसकी वजह से आरजेडी को तुरंत अलर्ट हो जाना चाहिए।
1. सत्ता से बाहर रहने का मानसिक और राजनीतिक दबाव
वरिष्ठ पत्रकार अशोक कुमार शर्मा के अनुसार, किसी भी क्षेत्रीय दल की सबसे बड़ी ताकत और कमजोरी उसकी सत्ता ही होती है।
“क्षेत्रीय पार्टियों का सांगठनिक ढांचा राष्ट्रीय दलों की तरह वैचारिक रूप से उतना मजबूत नहीं होता, जितना सत्ता के रसूख से जुड़ा होता है। पश्चिम बंगाल में जैसे ही टीएमसी के हाथ से सत्ता फिसली, नेताओं और विधायकों के भीतर असुरक्षा की भावना घर कर गई।”
यही स्थिति इस समय बिहार में आरजेडी की भी दिखाई देती है। आरजेडी लंबे समय से बिहार की सत्ता से बाहर है। बीच में कुछ महीनों के लिए दो बार नीतीश कुमार के साथ सरकार बनी जरूर, लेकिन वह भी ज्यादा दिन नहीं टिक सकी।
सत्ता का ‘सूखा’ और विधायकों की असुरक्षा
अशोक कुमार शर्मा आगे कहते हैं कि सत्ता से बाहर रहने के कारण विधायकों पर अपने क्षेत्र में काम कराने और अपना राजनीतिक वजूद बचाए रखने का भारी दबाव होता है। लंबे समय का यह सूखा विधायकों में असंतोष पैदा करता है, जिसे सत्ताधारी एनडीए (BJP-JDU) गठबंधन आसानी से भुना सकता है। अगर तेजस्वी यादव ने अपने विधायकों की इस छटपटाहट को नहीं समझा, तो बंगाल की कहानी बिहार में भी दोहराई जा सकती है।
आने वाला वर्ष आरजेडी और तेजस्वी यादव के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण होने वाला है। बंगाल के घटनाक्रम ने साफ कर दिया है कि अगर क्षेत्रीय दलों में आंतरिक लोकतंत्र और संवाद की कमी होगी, तो बिखराव को रोकना नामुमकिन हो जाएगा। अब देखना यह है कि क्या तेजस्वी यादव इस सियासी कड़वे सच को स्वीकार कर अपनी रणनीति बदलते हैं, या फिर बिहार में भी किसी नए राजनीतिक भूचाल की पटकथा लिखी जा चुकी है।
