कोलकाता का बेकबागान चौराहा, जो एक सुन्नी बहुल इलाका माना जाता है, आजकल एक अनूठी तस्वीर पेश कर रहा है। यहाँ ईरान के दिवंगत सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की तस्वीर वाला एक बड़ा पोस्टर लगा है, जिस पर लिखा है— “ईरान से सदा आई, शिया-सुन्नी भाई-भाई”।
यह दृश्य केवल कोलकाता तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया में एक बड़े भू-राजनीतिक और धार्मिक बदलाव का संकेत दे रहा है। अमेरिकी और इजरायली हमलों में खामेनेई की मौत के बाद, इतिहास में पहली बार शिया और सुन्नी समुदायों के बीच वह कड़वाहट कम होती दिख रही है जो सदियों से चली आ रही थी।
आमतौर पर वैचारिक मतभेद रखने वाले ये दोनों समुदाय भारत के विभिन्न हिस्सों में कंधे से कंधा मिलाकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।कोलकाता में जहां ‘ऑल बंगाल माइनॉरिटी यूथ फेडरेशन’ (एक मुख्य रूप से सुन्नी संगठन) ने बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किया। वहीं कश्मीर में भी सुन्नी बहुल होने के बावजूद पूरी घाटी में खामेनेई की मौत पर शोक मनाया गया और इजरायल-अमेरिका विरोधी नारे लगे।
लखनऊ और हैदराबाद के जानकारों का कहना है कि लखनऊ की सड़कों पर ऐसी भीड़ पहले कभी नहीं देखी गई, जहाँ अहल-ए-हदीस, सुन्नी और शिया सभी एक साथ मौजूद थे।
जादवपुर विश्वविद्यालय के पॉलिटिकल साईंस के प्रोफेसर अब्दुल मतीन ने एक इंटरव्यू में कहा कि, मुस्लिम समाज अब ईरान पर हमले को आंतरिक संप्रदायिक संघर्ष के रूप में नहीं, बल्कि पश्चिम के ‘साम्राज्यवादी हमले’ के रूप में देख रहा है। फिलिस्तीन के मुद्दे पर ईरान की मजबूती ने उसे सुन्नियों के बीच भी नायक बना दिया है।
इस्लाम में यह विभाजन 632 ईस्वी में पैगंबर मुहम्मद की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार को लेकर शुरू हुआ था। दुनिया की मुस्लिम आबादी का लगभग 85-90% हिस्सा सुन्नी है। पाकिस्तान में शिया आबादी लगभग 15% है, लेकिन वहाँ भी सुन्नी संगठनों ने खामेनेई को ‘शहीद’ बताकर प्रदर्शन किए। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने भी अमेरिका और सऊदी अरब से करीबी रिश्तों के बावजूद खामेनेई को आधिकारिक तौर पर सम्मान दिया।
चौंकाने वाली बात बांग्लादेश से आ रही है। ढाका में ‘बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी’ जैसे कट्टर सुन्नी संगठन ने ईरान पर हमले को लोकतंत्र और मानवाधिकारों पर हमला बताया है। शोधकर्ता अल्ताफ परवेज के अनुसार, “हालांकि लाखों बांग्लादेशी सऊदी अरब और खाड़ी देशों में काम करते हैं, लेकिन सोशल मीडिया पर लोग इन अरब देशों को ‘अमेरिका की कठपुतली’ मान रहे हैं और ईरान के जवाबी हमलों का जश्न मना रहे हैं।”
भारत में इस एकजुटता और बढ़ते जनाक्रोश को देखते हुए केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सभी राज्यों को अलर्ट जारी किया था। कई संवेदनशील इलाकों में इंटरनेट की रफ्तार धीमी की गई और धारा 144 लागू की गई। लखनऊ और दिल्ली में कुछ प्रदर्शनकारियों पर पुलिसिया कार्रवाई भी हुई, लेकिन विरोध का स्वर कम नहीं हुआ।
विशेषज्ञों का मानना है कि 2010 में खामेनेई द्वारा सुन्नी महापुरुषों के अपमान के खिलाफ जारी किए गए फतवे और फिलिस्तीन के लिए ईरान के अडिग रुख ने दक्षिण एशिया के सुन्नियों के मन में ईरान के प्रति जगह बनाई है। यह पहली बार है जब पश्चिम एशिया की ‘प्रॉक्सि वॉर’ (सऊदी बनाम ईरान) का असर दक्षिण एशिया के समुदायों को बांटने के बजाय उन्हें करीब ला रहा है।
















