बीते विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद गहरे राजनीतिक संकट से जूझ रही तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने संगठन में बड़ा फेरबदल किया है. पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी के आवास पर शनिवार को हुई वरिष्ठ नेताओं की बैठक के बाद कई महत्वपूर्ण फैसलों का ऐलान किया गया. इन बदलावों को पार्टी के भीतर बढ़ती बगावत और नेतृत्व पर उठ रहे सवालों के बीच संगठन को संभालने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है.
सबसे अहम फैसलों में युवा तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष सायोनी घोष को उनके पद से हटाया जाना शामिल है. वहीं पार्टी के मुखर नेता कुणाल घोष को उत्तर कोलकाता जिला इकाई का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है. इसके अलावा वरिष्ठ सांसद सौगत रॉय को लोकसभा में पार्टी का सलाहकार बनाया गया है. यह फेरबदल ऐसे समय में हुआ है जब पार्टी अपने इतिहास के सबसे बड़े आंतरिक संकट का सामना कर रही है. हाल के दिनों में टीएमसी के भीतर असंतोष खुलकर सामने आया है और बागी नेताओं का एक बड़ा समूह नेतृत्व के खिलाफ मोर्चा खोल चुका है.
कुणाल घोष को उत्तर कोलकाता इकाई की जिम्मेदारी सौंपे जाने को राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है. अब तक इस इकाई का संचालन एक कोर कमेटी के जरिए किया जा रहा था, जिसकी अगुवाई वरिष्ठ सांसद सुदीप बंद्योपाध्याय कर रहे थे. दिलचस्प बात यह है कि सुदीप बंद्योपाध्याय ने शनिवार को उस पत्र पर हस्ताक्षर किए थे, जिसे पार्टी के बागी गुट ने टीएमसी के भीतर अलग समूह के तौर पर मान्यता देने की मांग के साथ तैयार किया है. ऐसे में उत्तर कोलकाता संगठन की कमान कुणाल घोष को सौंपना ममता बनर्जी का एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश माना जा रहा है.
पार्टी ने अनुभवी सांसद सौगत रॉय को लोकसभा में सलाहकार की भूमिका देकर संसदीय रणनीति को मजबूत करने का संकेत दिया है. माना जा रहा है कि संसद के भीतर और बाहर पार्टी के सामने खड़ी चुनौतियों से निपटने में उनका अनुभव अहम भूमिका निभाएगा. बैठक में अभिषेक बनर्जी, कल्याण बनर्जी समेत कई वरिष्ठ नेता मौजूद थे. पार्टी नेतृत्व ने मौजूदा संकट पर विस्तार से चर्चा की और संगठन को फिर से मजबूत करने की रणनीति पर विचार-विमर्श किया.
इस बीच टीएमसी की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं. काकोली घोष दस्तिदार के नेतृत्व वाला बागी गुट दावा कर रहा है कि उसे पार्टी के 28 में से 19 लोकसभा सांसदों का समर्थन हासिल है. इस गुट ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात कर खुद को वास्तविक टीएमसी के रूप में मान्यता देने की मांग करने का फैसला किया है. बागी नेताओं का कहना है कि पार्टी का वर्तमान नेतृत्व जनता और जमीनी कार्यकर्ताओं से कट चुका है. दूसरी ओर, टीएमसी नेतृत्व इस दावे को चुनौती दे रहा है और संगठन पर अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश में जुटा है.
संकट केवल लोकसभा तक सीमित नहीं है. पश्चिम बंगाल विधानसभा में भी टीएमसी को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा है. पार्टी के 80 में से 64 विधायक अलग हो चुके हैं और उन्हें विधानसभा अध्यक्ष से मान्यता भी मिल गई है. बागी खेमे के नेता ऋतब्रत बनर्जी को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दी जा चुकी है. हालांकि इस फैसले को लेकर कानूनी लड़ाई जारी है और मामला कलकत्ता हाईकोर्ट में चुनौती के दायरे में है. इस बीच, पूर्व मंत्री मानस भुइयां के पार्टी से इस्तीफा देने से संकट और गहरा गया है. लगातार हो रहे इस्तीफों और टूट की घटनाओं ने ममता बनर्जी के सामने संगठन को एकजुट रखने की बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है.