EXPLAINER: ‘दीदी’ की सबसे ‘सयानी’ शिष्या ने क्यों बदला पाला?

बड़ी बातें:

  • सायोनी घोष ने बागी सांसदों के साथ स्पीकर को लिखा पत्र।
  • टीएमसी से नाता तोड़ सदन में अलग बैठने की मांग की।
  • विपक्षी खेमे को छोड़ NDA को समर्थन देने का किया एलान।

पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस वक्त सबसे बड़ा भूचाल आया हुआ है। कल तक जो नेता ममता बनर्जी की आंख के तारे थे, वो अब दीदी की ‘आंख की किरकिरी’ बनते जा रहे हैं। चुनाव में मिली हार के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) ताश के पत्तों की तरह बिखरती दिख रही है।

इस बगावत की लिस्ट में सबसे चौंकाने वाला और बड़ा नाम है— सायोनी घोष का। जो कभी ममता बनर्जी की सबसे भरोसेमंद ‘सिपहसालार’ थीं, आज उन्होंने ही पाला बदल लिया है। सयानी ने टीएमसी के बागी सांसदों के साथ मिलकर लोकसभा स्पीकर को पत्र लिखा है और सदन में अलग बैठने के साथ-साथ NDA को समर्थन देने का एलान कर दिया है।

आइए समझते हैं कि ममता की प्रयोगशाला से निकली इस सबसे तेज-तर्रार नेता का ‘हृदय परिवर्तन’ आखिर कैसे हुआ?

1. 2021: जब ‘दीदी’ की कसौटी पर खरी उतरीं सयानी

साल 2021 के विधानसभा चुनाव में जब बंगाल फतह करने के लिए बीजेपी ने पूरी ताकत झोंक दी थी, तब ममता बनर्जी को ऐसे युवा चेहरों की तलाश थी जो सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक बीजेपी को उसी की आक्रामक भाषा में जवाब दे सकें।

  • एंट्री: जानी-मानी बंगाली अभिनेत्री और गायिका सायोनी घोष की टीएमसी में एंट्री हुई।
  • तेवर: सायोनी की आवाज यानी ममता के बोल। बीजेपी पर तीखे कटाक्ष और बंगाली अस्मिता का मुद्दा उठाकर सयानी जल्द ही ममता बनर्जी की सबसे प्रिय शिष्या बन गईं।
  • बड़ा इनाम: चुनाव हारने के बावजूद ममता ने उन पर भरोसा जताया और उन्हें युवा तृणमूल कांग्रेस का अध्यक्ष बना दिया— यह वही पद था जो पहले ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी संभालते थे।

2. सायोनी से TMC को क्या फायदा हुआ?

ममता बनर्जी ने सायोनी घोष को अपनी सियासी प्रयोगशाला में तराशा था। सायोनी के जरिए टीएमसी ने कई मोर्चों पर बढ़त बनाई:

मोर्चाटीएमसी को क्या मिला?
युवा और महिलाएंसिनेमाई लोकप्रियता के कारण युवाओं और महिला वोटर्स के बीच पैठ मजबूत हुई।
सोशल मीडियासायोनी की बेबाक शैली ने इंटरनेट पर टीएमसी के नैरेटिव को धार दी।
संगठनअभिषेक बनर्जी के बाद संगठन में नई पीढ़ी का एक बड़ा चेहरा तैयार हुआ।

3. ‘गुरु गुड़ और चेला शक्कर’

जिस तरह कभी कांग्रेस में रहते हुए ममता बनर्जी ने अपनी आक्रामक शैली से अपनी अलग पहचान बनाई थी, ठीक वैसे ही सायोनी ने खुद को गढ़ा। सायोनी के ध्रुवीकरण वाले बयानों को भी ममता का पूरा शह मिला। दोनों की जुगलबंदी को बंगाल की सियासत में ‘गुरु-शिष्या’ की सबसे कामयाब मिसाल माना जाने लगा। लेकिन राजनीति में न तो समर्पण स्थायी होता है और न ही विरोध।

सियासत का दस्तूर: “राजनीति सयाने लोगों का वो मजमा है, जहां ऋतुओं (मौसम) से ज्यादा नेताओं का हृदय-परिवर्तन होता है।”

4. 2026 की आंधी और ‘हृदय परिवर्तन’

ममता बनर्जी और सायोनी, दोनों में से किसी ने नहीं सोचा था कि साल 2026 में बीजेपी की ऐसी आंधी आएगी कि टीएमसी के हाथ से सत्ता फिसल जाएगी।

सत्ता बदलते ही हवा का रुख भांपने में सायोनी घोष वाकई ‘सयानी’ साबित हुईं। जैसे ही टीएमसी कमजोर हुई, सायोनी ने ममता के ‘गढ़’ को छोड़ एनडीए का दामन थामने में देर नहीं लगाई। आज ‘गुरु गुड़ और चेला शक्कर’ हो चुका है, यानी शिष्या अब गुरु से दो कदम आगे निकलकर अपनी नई सियासी जमीन तलाश चुकी है।

सायोनी घोष का यह कदम सिर्फ एक सांसद की बगावत नहीं है, बल्कि ममता बनर्जी के उस आक्रामक मॉडल की हार है जिसे उन्होंने खुद अपने हाथों से तैयार किया था। बंगाल की राजनीति अब किस करवट बैठेगी, यह देखना दिलचस्प होगा।

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