क्या ‘सोशल इंजीनियरिंग’ और ‘घर वापसी’ के दम पर खोया वैभव पाएगी बसपा?

मुख्य बिंदु:

  • जनाधार बचाने की कवायद: हाशिए पर खिसकते वोटबैंक को थामने के लिए मायावती ने चला ‘घर वापसी’ का दांव.
  • त्रिकोणीय और चतुष्कोणीय मुकाबले की बिसात: पश्चिमी यूपी, अवध और पूर्वांचल के कई क्षत्रपों के बसपा के संपर्क में होने की अटकलें.
  • गठबंधन के कयास: कांग्रेस नेताओं की ‘सद्भावना यात्रा’ से यूपी के सियासी गलियारों में सुगबुगाहट तेज.

उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपनी खोई हुई जमीन (Political Turf) को दोबारा हासिल करने के लिए बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने अभी से 2027 के विधानसभा चुनाव की रणनीतिक बिसात बिछानी शुरू कर दी है। भाजपा और समाजवादी पार्टी के ध्रुवीकरण के बीच खुद को ‘उपेक्षित’ महसूस कर रहे सामाजिक वर्गों को साधने के लिए बसपा सुप्रीमो मायावती ने अपनी परंपरागत ‘सोशल इंजीनियरिंग’ को नए कलेवर में पेश करने का फैसला किया है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बसपा के लिए अपने वजूद को प्रासंगिक बनाए रखने की एक गंभीर जद्दोजहद है। आइए तफ़्सील से समझते हैं मायावती के इस नए चक्रव्यूह को:

1. ‘घर वापसी’ और क्षत्रपों को साधने की रणनीति

लगातार चुनावी पराजयों से जूझ रही बसपा के सांगठनिक ढांचे को पुनर्जीवित करने के लिए मायावती ने ‘घर वापसी’ का मास्टरस्ट्रोक खेला है। पार्टी कोऑर्डिनेटरों को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि वे उन पुराने दिग्गजों और क्षेत्रीय क्षत्रपों से दोबारा संपर्क साधें, जिनका अपने इलाकों में मजबूत जनाधार है।

सूत्रों का दावा: पश्चिमी यूपी, अवध और पूर्वांचल के कई पूर्व सांसद और विधायक इस समय बसपा नेतृत्व के संपर्क में हैं। विशेष रूप से वे नेता, जिन्हें आगामी चुनावों में अपनी मौजूदा पार्टियों से टिकट कटने या ‘असंतोष’ की आशंका है, वे पाला बदलने की फिराक में हैं। माना जा रहा है कि आगामी दो-तीन महीनों में बसपा में एक बड़ा ‘दल-बदल’ देखने को मिल सकता है।

2. कांग्रेस के साथ ‘मौन’ गठबंधन की सुगबुगाहट?

यूपी के सियासी गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा बसपा और कांग्रेस के बीच संभावित ‘चुनावी समीकरण’ (Tactical Alliance) को लेकर है। हालांकि दोनों ओर से आधिकारिक तौर पर ‘रहस्यमयी चुप्पी’ साधी गई है, लेकिन पर्दे के पीछे की हलचल कुछ और ही बयां करती है।

बीती 20 मई को कांग्रेस के दो दिग्गज दलित चेहरे—बाराबंकी के सांसद तनुज पुनिया और अनुसूचित जाति विभाग के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेंद्र पाल गौतम—लखनऊ स्थित मायावती के आवास पहुंचे थे। भले ही इस ‘हाई-प्रोफाइल’ मुलाकात में मायावती से सीधे तौर पर संवाद नहीं हो सका, लेकिन इस घटनाक्रम ने यूपी की सियासत में ‘संभावनाओं के नए द्वार’ खोल दिए हैं। राजनीतिक पंडितों के अनुसार, वर्तमान परिस्थितियों में यदि दोनों दल किसी ‘अघोषित सहमति’ पर पहुंचते हैं, तो यह दोनों के लिए पारस्परिक रूप से लाभकारी (Mutually Beneficial) सिद्ध हो सकता है।

3. त्रिमूर्ति को कमान: 2007 के ‘जादुई फॉर्मूले’ की री-लॉन्चिंग

मायावती एक बार फिर अपने उस ऐतिहासिक 2007 के फॉर्मूले को दोहराने की कोशिश में हैं, जिसने उन्हें पूर्ण बहुमत की सरकार दिलाई थी। इस बार पार्टी ने विभिन्न जातियों को गोलबंद (Mobilize) करने के लिए अपनी ‘त्रिमूर्ति’ को बड़ी जिम्मेदारी सौंपी है:

नेता का नामलक्षित सामाजिक वर्गमुख्य कार्यभार
सतीश चंद्र मिश्राब्राह्मण समाजप्रबुद्ध वर्ग को पुनः बसपा से जोड़ना
उमाशंकर सिंहक्षत्रिय समाजसवर्ण वोटबैंक में पैठ बनाना
विश्वनाथ पालअति पिछड़ा वर्ग (OBC)गैर-यादव पिछड़ों को लामबंद करना

इसके साथ ही, अगले तीन महीनों के भीतर सभी कोऑर्डिनेटरों को ‘मुस्लिम भाईचारा समितियां’ गठित करने का कड़ा टास्क दिया गया है, ताकि दलित-मुस्लिम गठजोड़ को दोबारा जिंदा किया जा सके।

4. सपा के ‘PDA’ को चुनौती और भाजपा को परोक्ष लाभ!

बसपा की इस आक्रामक सक्रियता ने विपक्षी खेमे, विशेषकर समाजवादी पार्टी (सपा) के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। सपा जहां अपने PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के सहारे सत्ता का ख्वाब देख रही है, वहीं बसपा सीधे तौर पर दलित और मुस्लिम मतों में सेंधमारी करने की फिराक में है।

सियासी गणित: यदि मुस्लिम मतों में बिखराव (Fragmentation) होता है, तो इसका सीधा नुकसान सपा को उठाना पड़ेगा। ऐसी स्थिति में मतों का ध्रुवीकरण सत्तारूढ़ भाजपा के पक्ष में जाने की प्रबल संभावना जताई जा रही है।

राजनीतिक विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि हालिया वर्षों में बसपा ने अभूतपूर्व सांगठनिक और चुनावी गिरावट का सामना किया है। मायावती के पिछले कई प्रयोग विफल रहे हैं। ऐसे में यदि पार्टी इस बार कोई ठोस, स्पष्ट और धारदार रणनीति पेश करने में नाकाम रहती है, तो उसके ‘हाशिए (Political Obsolescence)’ पर जाने का खतरा बढ़ जाएगा। यही वजह है कि प्रभावशाली नेताओं को जोड़ना और गठबंधन की संभावनाओं को टटोलना, बसपा की एक सोची-समझी ‘अस्तित्व बचाने की रणनीति’ का हिस्सा है।

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