बिहार की सियासत में एक बार फिर शह और मात का खेल शुरू हो चुका है। मौका है विधान परिषद (MLC) की 10 सीटों पर होने वाले चुनाव का। नामांकन की आखिरी तारीख 8 जून है, लेकिन सस्पेंस और जोड़-तोड़ की राजनीति चरम पर है।
अखबार के पन्नों से लेकर सोशल मीडिया तक सिर्फ तीन ही सवाल तैर रहे हैं— पहला, चिराग पासवान का उम्मीदवार कौन सा दांव खेलेगा? दूसरा, नीतीश सरकार के बिना सदन वाले मंत्री दीपक प्रकाश का क्या होगा? और तीसरा, क्या बीजेपी-जेडीयू के ‘एक्स्ट्रा’ उम्मीदवारों से एनडीए के भीतर ही घमासान मचेगा?
आइए, आसान भाषा में समझते हैं कि बिहार विधान परिषद चुनाव का पूरा गणित और पेंच कहां फंसा है।
1. सीटों का समीकरण: 9 नियमित, 1 उपचुनाव
जिन 10 सीटों पर चुनाव हो रहे हैं, उनका गणित इस प्रकार है:
- नियमित सीटें: 9
- उपचुनाव वाली सीट: 1 (यह सीट मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इस्तीफे से खाली हुई है)
जीत के लिए कितने वोट चाहिए?
बिहार विधानसभा के मौजूदा संख्या बल के हिसाब से विधान परिषद की एक नियमित सीट जीतने के लिए कम से कम 25 विधायकों के समर्थन की जरूरत है।
2. एनडीए (NDA) का पलड़ा भारी, लेकिन ‘घर’ में ही फंसा पेंच
एनडीए के पास कुल 201 विधायक हैं। इस हिसाब से नियमित 9 सीटों में से 8 सीटों पर एनडीए की जीत बिल्कुल तय है। लेकिन टिकट बंटवारे ने सहयोगियों की धड़कनें बढ़ा दी हैं:
- बीजेपी: 4 उम्मीदवार घोषित
- जेडीयू: 4 उम्मीदवार घोषित
- एलजेपी (रामविलास): 1 उम्मीदवार (अरशद अंसारी)
पेंच नंबर 1: बीजेपी और जेडीयू ने मिलकर ही 8 सीटें (4-4) अपने नाम कर लीं। अब चिराग पासवान की पार्टी ने 9वें उम्मीदवार के रूप में अरशद अंसारी को उतारकर सियासी दांव चल दिया है।
3. महागठबंधन: संख्या बल है, पर अपनों का डर भी!
महागठबंधन के पास कुल 41 विधायक हैं। जीत के लिए सिर्फ 25 वोट चाहिए, इसलिए महागठबंधन आसानी से 1 सीट जीत सकता है।
लेकिन, राज्यसभा चुनाव में राजद (RJD) और कांग्रेस के कुछ विधायकों ने क्रॉस वोटिंग (गच्चा) की थी। इसके बावजूद राजद को ज्यादा घबराने की जरूरत नहीं है, क्योंकि उनके पास ‘सरप्लस’ (अतिरिक्त) विधायक मौजूद हैं।
4. सबसे बड़ा सस्पेंस: मंत्री दीपक प्रकाश का क्या होगा?
इस पूरे चुनाव के सबसे बड़े ‘एक्स फैक्टर’ हैं राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) चीफ उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश।
- दीपक प्रकाश फिलहाल नीतीश-सम्राट सरकार में मंत्री हैं।
- वे न तो विधानसभा (MLA) के सदस्य हैं और न ही विधान परिषद (MLC) के।
- नियम क्या कहता है? संविधान के मुताबिक, बिना किसी सदन का सदस्य बने कोई भी व्यक्ति अधिकतम 6 महीने तक ही मंत्री रह सकता है। दीपक प्रकाश के पास अब सिर्फ 5 महीने बचे हैं। अगर वे इस बार MLC नहीं बने, तो उन्हें मंत्री पद छोड़ना पड़ेगा।
कुशवाहा की ‘रहस्यमयी’ निश्चिंतता
हैरानी की बात यह है कि एनडीए कोटे से दीपक प्रकाश का एमएलसी बनना फिलहाल नामुमकिन दिख रहा है, फिर भी उपेंद्र कुशवाहा बिल्कुल शांत हैं। शनिवार को जब मीडिया ने उनसे पूछा, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा— “नामांकन परसों है न, इंतजार कीजिए. सब पता चल जाएगा।”
राजनीतिक पंडितों का मानना है कि राज्यसभा चुनाव की तरह इस बार भी अमित शाह और बीजेपी नेतृत्व से उनकी कोई ‘सीक्रेट डील’ हुई है।
5. चिराग पासवान का ‘मुस्लिम कार्ड’ और नया समीकरण
चिराग पासवान ने अरशद अंसारी को 9वां उम्मीदवार बनाकर एनडीए और महागठबंधन दोनों को चौंका दिया है।
- बीजेपी-जेडीयू के पास अपने 8 उम्मीदवारों को जिताने के बाद चिराग के उम्मीदवार के लिए पर्याप्त वोट नहीं बचेंगे।
- ऐसे में कयास लगाए जा रहे हैं कि महागठबंधन और AIMIM के मुस्लिम विधायक पाला बदलकर चिराग के मुस्लिम उम्मीदवार (अरशद अंसारी) के पक्ष में गोलबंद हो सकते हैं।
अब आगे क्या? ये हैं 2 बड़ी संभावनाएं
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, इस उलझे हुए समीकरण को सुलझाने के केवल दो ही रास्ते दिख रहे हैं:
| परिस्थिति | संभावित रास्ता | असर |
| संभावना 1 | बीजेपी या जेडीयू का पीछे हटना | बीजेपी या जेडीयू अपने 4-4 उम्मीदवारों में से किसी एक का नाम वापस ले ले, ताकि दीपक प्रकाश या चिराग के उम्मीदवार के लिए रास्ता साफ हो सके। |
| संभावना 2 | इस्तीफा और विधानसभा का रास्ता | दीपक प्रकाश मंत्री पद से इस्तीफा दें। इसके बाद आरएलएम (RLM) के अपने 4 विधायकों में से किसी एक से इस्तीफा दिलवाकर दीपक प्रकाश को विधानसभा उपचुनाव के रास्ते सदन में लाया जाए। (हालांकि, इसमें समय लगेगा और तब तक मंत्री पद छोड़ना होगा)। |
बिहार विधान परिषद का यह चुनाव केवल सीटों का नहीं, बल्कि एनडीए के भीतर ‘गठबंधन धर्म’ और नीतीश सरकार के एक मंत्री की कुर्सी बचाने की परीक्षा है। 8 जून की शाम तक यह साफ हो जाएगा कि ऊंट किस करवट बैठता है।